झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४२ | झांसी की रानी
[ ६५ ] पीरअली इतनी तेजी के साथ गया कि उसको जनरल रोज़ का दूत मार्ग में मिल गया । उसने जनरल रोज़ के पास पहुँचने की प्रार्थना की । पीरअली को रोज़ के पास पहुँचा दिया गया । उसके पास नवाब अलीबहादुर का सन्देसा और पीरअली का नाम पहुँच चुका था । पीरअली को पाकर रोज़ प्रसन्न हुआ । पीरअली ने रोज़ को झासी की पक्की और कच्ची सब बाते सुनाई । स्त्रियों की सेना का सविस्तार वर्णन सुनकर रोज़ हैरान हो गया । हिन्दुस्थान की स्त्रिया सिपाहीगिरी का काम करती हैं । उसको विश्वास न होता था, परन्तु अलीबहादुर की चिट्ठियो से और उसने बम्बई में आते ही विप्लवकारियो का जो वर्णन सुना था और उस वर्णन में रानी ने जो स्थान पाया था, उससे वह इस असम्भव बात को मानने के लिये तैयार हो गया । रोज़ ने पूछा, 'रानी ने अङ्गरेज बच्चो और स्त्रियो का कतल करवाया ? 'हर्गिज नहीं,' पीरअली ने सच्चा उत्तर दिया । रोज़ को मार्टिन की चिट्ठी की बात जबलपुर के कमिश्नर ने बतलाई थी, और उसने मार्टिन की चिट्ठी पर अपना अविश्वास भी प्रकट किया था । परन्तु रोज़ और उसके साथी अङ्गरेज रानी की निर्दोषिता को मानने के लिये तैयार ही न थे । झासी के कुछ लोगो ने उनके बालबच्चो का वध किया था, इसलिये उनको सारी झासी और सारी भूमि से बदला लेना था । रानी झासी का सजग चिन्ह थी, इसलिये उनको दोषमुक्त कैसे माना जा सकता था ? दूत ने रानी का जो उत्तर दिया, वह शिष्ट और मधुर होते हुये भी स्पष्ट था । रोज़ ने १७ मार्च को तालबेहट से कूच करके बेतवा पार की । पीरअली आगे किस प्रकार जनरल रोज़ की सहायता करेगा, यह तै हो गया और वह शीघ्र झाँसी लौट आया । रोज़ झाँसी की ओर सावधानी के साथ बढा । आसपास का प्रदेश दृढता के साथ अपने अधिकार में करने में उसको दो तीन दिन लग गये ।