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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 352

लक्ष्मीबाई ३४१ मैंने तो दरबार में', रानी ने कहा, 'बड़ी कठिनाई से हँसी को रोक पाया। मोतीबाई ! मोतीबाई कैसा बढ़िया नाम है।' और वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। मोतीबाई भी हँसते हँसते बोली, 'सरकार, मेरी चल नही सकती थी, नही तो में चिट्ठी के सिरनामे पर लिखवाती 'मैम साहब रोज को मोतीबाई का सलाम । चुपचाप हिन्दुस्थान को पीठ दिखाओ और अपनी विलायत में झख मारो।' जब यह चिट्ठी उसकी फौज में चर्चा पाती तब उस मुँहजले को मुँह दिखलाने में लाज आती।' रानी गम्भीर हो गई । 'पीरअली कल तो लौट आवेगा ?' 'यदि उसको किसी ने मार्ग में ही समाप्त न कर दिया तो।' 'आदमी तो चतुर है।' 'बहुत काइयाँ। मुझको उस पर कभी कभी अविश्वास हो जाता था, परन्तु कुछ दिनो से वह ऐसा जी लगाकर काम करता है कि सन्देह निवृत्त हो गया।' 'अङ्गरेजो के साथ हिन्दुस्थानी सिपाही भी हैं।' 'मैने भी सुना है। भोपाल और हैदराबाद की रियासतो के दस्ते | हैं। कुछ तिलङ्गा पल्टन है, बाक़ी गोरे।' 'सब कितने होगे ?' 'सरकार ठीक ठीक पता तो नही। कई हजार हैं। ठीक बात पीरअली के लौटने पर मालूम होगी।'