भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३४० झाँसी की रानी मिलने के लिये क्यो बुलाया-इसका व्योरा आपने कुछ नही दिया । मिलाप के पर्दे में मुझे धोखा दिखलाई पडता है । मै स्त्री हू । निश्शस्त्र कैसे आ सकती हू ? राज्य के दीवान और वख्शी ससैन्य आ सकते हैं।' रानी ने इस चिट्ठी पर अपने हस्ताक्षर किये । भोपटकर से कहा, 'आपकी नीति का क्या फल हुआ ?' उसने उत्तर दिया 'यही कि अंग्रेज लोग बिना सूचना के झाँसी पर नही चढ दौडे ।' 'मार्टिन को चिट्ठी लिखी थी ?' 'हा सरकार । उसने जबलपूर के कमिश्नर को और इस जनरल को अवश्य कुछ लिखा होगा ।' 'फल ?' 'कुछ समय मिल गया, यही बहुत है ।' दूत को रानी की चिट्ठी देदी गई । दूत गया । उसने प्रस्थान न कर पाया होगा कि पीरअली ने रानी के पास सदेसा भेजा, सरकार की आज्ञा हो तो में अंग्रेज छावनी की खबर ले आऊँ कि कितनी और कैसी सेना है, तथा कितनी तोपें हैं और वे लोग किस ढँग से झाँसी पर आक्रमण करेगे ।' मोतीबाई ने इन बातो का पता लगाने का सामर्थ्य तो प्रकट किया, परन्तु पीरअली के भेजे जाने पर आक्षेप नही किया । पीरअली को अनुमति मिल गई । रानी ने मोतीबाई से कहा, 'तेरा नाम कैसे सुन्दर रूप में अंग्रेजो के पास पहुचा है । मुझको कोई सन्देह नही मेरे जासूसी विभाग के सरदार को ही माई बना लिया गया है ।' मोतीबाई बोली, 'सरकार के सामने गाली नही निकलती, परन्तु यदि उन मुँहझौसे रोज को पा गई तो तोप, बन्दूक या तलवार से सच्चा नाम बतलाये बिना न मानूँगी ।'