झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३३६ दिया जाना चाहिये। दूत को शीघ्र लौटना है, क्योकि उसको कोई भी अपने घर नही ठहराना चाहेगा। भाऊ बख्शी ने कहा, 'और रोज़ यहा से बहुत दूर भी नही है। शायद दूत के पीछे पीछे आ रहा हो।' मोतीबाई ने पूछा, 'और यह मोतीसाई कौन सी बला है ? इसका क्या उत्तर होगा ?' रानी ने हँसी को दबाकर कहा, 'मै बतलाऊँगी।' लक्ष्मणराव फिर बोला, 'क्या उत्तर दिया जाय ?' रानी ने और भी अधिक गंभीर होकर कहा, 'मै अकेली उत्तर देने वाली कौन होती हूँ ? झासी के समग्र मुखियो को, सब जातियो के पञ्चो को जोड़ो। अपने सब सरदार इस समय झासी में ही हैं। वे सब और आप लोग एकमत होकर कहदे तो मै अकेली निश्शस्त्र चली जाऊँगी।' वाक्य समाप्त होते होते रानी ने श्वास और उच्छ्वास लिये और किसी उखडते हुये भाव का कठिनता के साथ, कठोरता के साथ नियन्त्रण किया। तुरन्त झासी के मुखिया, पञ्च, सरदार इत्यादि इकट्ठे किये गये। जो कुछ उन लोगो ने कहा उसमे महत्व की बाते ये थी। 'लडेंगे। अपनी झासी के लिये, अपनी रानी के लिये, मरेंगे।' 'हमारे पास जितना रुपया और आभूषण हैं, सब स्वराज्य की लड़ाई के लिये रानी के हाथ सकल्प है।' 'हम दिखलायेंगे कि झासी का पानी कितना स्वच्छ और कितना गहरा है।' 'आप अङ्गरेजो को उत्तर दीजिये कि झासी उन लोगो को मा की छठी के दूध की याद दिलावेगी।' जनमत रानी के मत से मिला हुआ था ही, इस समय बहुत प्रवल हो गया। परन्तु रानी ने झासी की हुँकार को, वीणा की टङ्कार मे परिवर्तित करके भेजा। उन्होने लिखा।