झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
लक्ष्मीबाई ३४१ मैंने तो दरबार में', रानी ने कहा, 'बड़ी कठिनाई से हँसी को रोक पाया। मोतीबाई ! मोतीबाई कैसा बढ़िया नाम है।' और वह खिलखिलाकर हँस पड़ी। मोतीबाई भी हँसते हँसते बोली, 'सरकार, मेरी चल नही सकती थी, नही तो में चिट्ठी के सिरनामे पर लिखवाती 'मैम साहब रोज को मोतीबाई का सलाम । चुपचाप हिन्दुस्थान को पीठ दिखाओ और अपनी विलायत में झख मारो।' जब यह चिट्ठी उसकी फौज में चर्चा पाती तब उस मुँहजले को मुँह दिखलाने में लाज आती।' रानी गम्भीर हो गई । 'पीरअली कल तो लौट आवेगा ?' 'यदि उसको किसी ने मार्ग में ही समाप्त न कर दिया तो।' 'आदमी तो चतुर है।' 'बहुत काइयाँ। मुझको उस पर कभी कभी अविश्वास हो जाता था, परन्तु कुछ दिनो से वह ऐसा जी लगाकर काम करता है कि सन्देह निवृत्त हो गया।' 'अङ्गरेजो के साथ हिन्दुस्थानी सिपाही भी हैं।' 'मैने भी सुना है। भोपाल और हैदराबाद की रियासतो के दस्ते | हैं। कुछ तिलङ्गा पल्टन है, बाक़ी गोरे।' 'सब कितने होगे ?' 'सरकार ठीक ठीक पता तो नही। कई हजार हैं। ठीक बात पीरअली के लौटने पर मालूम होगी।'
३४२ | झांसी की रानी
[ ६५ ] पीरअली इतनी तेजी के साथ गया कि उसको जनरल रोज़ का दूत मार्ग में मिल गया । उसने जनरल रोज़ के पास पहुँचने की प्रार्थना की । पीरअली को रोज़ के पास पहुँचा दिया गया । उसके पास नवाब अलीबहादुर का सन्देसा और पीरअली का नाम पहुँच चुका था । पीरअली को पाकर रोज़ प्रसन्न हुआ । पीरअली ने रोज़ को झासी की पक्की और कच्ची सब बाते सुनाई । स्त्रियों की सेना का सविस्तार वर्णन सुनकर रोज़ हैरान हो गया । हिन्दुस्थान की स्त्रिया सिपाहीगिरी का काम करती हैं । उसको विश्वास न होता था, परन्तु अलीबहादुर की चिट्ठियो से और उसने बम्बई में आते ही विप्लवकारियो का जो वर्णन सुना था और उस वर्णन में रानी ने जो स्थान पाया था, उससे वह इस असम्भव बात को मानने के लिये तैयार हो गया । रोज़ ने पूछा, 'रानी ने अङ्गरेज बच्चो और स्त्रियो का कतल करवाया ? 'हर्गिज नहीं,' पीरअली ने सच्चा उत्तर दिया । रोज़ को मार्टिन की चिट्ठी की बात जबलपुर के कमिश्नर ने बतलाई थी, और उसने मार्टिन की चिट्ठी पर अपना अविश्वास भी प्रकट किया था । परन्तु रोज़ और उसके साथी अङ्गरेज रानी की निर्दोषिता को मानने के लिये तैयार ही न थे । झासी के कुछ लोगो ने उनके बालबच्चो का वध किया था, इसलिये उनको सारी झासी और सारी भूमि से बदला लेना था । रानी झासी का सजग चिन्ह थी, इसलिये उनको दोषमुक्त कैसे माना जा सकता था ? दूत ने रानी का जो उत्तर दिया, वह शिष्ट और मधुर होते हुये भी स्पष्ट था । रोज़ ने १७ मार्च को तालबेहट से कूच करके बेतवा पार की । पीरअली आगे किस प्रकार जनरल रोज़ की सहायता करेगा, यह तै हो गया और वह शीघ्र झाँसी लौट आया । रोज़ झाँसी की ओर सावधानी के साथ बढा । आसपास का प्रदेश दृढता के साथ अपने अधिकार में करने में उसको दो तीन दिन लग गये ।
लक्ष्मीबाई ३४३ इसी समय रोज को प्रधान सेनापति कैम्बैल का आदेश मिला— 'तात्या टोपे ने चरखारी के राजा को घेर लिया है। पहले चरखारी की सहायता करो।' रोज ने आदेश 'का उल्ल घन किया—वह झासी के महत्व को जानता था। उसने उत्तर दिया, 'मै आज्ञा की अवज्ञा के लिये क्षमा चाहता हूं। चरखारी का गिर पडना या खडा रहना कुछ मूल्य नही रखता। मुझको पहले झासी से निबटना है।' चरखारी को राजभक्ति का पुरस्कार मिल गया। तात्या टोपे ने चरखारी से २४ तोपें और तीन लाख रुपये छीन लिये, और कालपी लौट आया। पीरअली ने जो समाचार रानी के पास भिजवाया वह बहुत अनोखा न था, परन्तु उसको काफी महत्व दिया गया। उसने बतलाया कि पलटने अमुक-अमुक नम्बर की हैं और प्रत्येक पलटन में इतने सिपाही। तोपो की गिनती बतलाई और प्रबन्ध की खूबी को प्रकट किया। रोज की कुल सेना सात हजार कूती गई। नाना भोपटकर तक को पीरअली का विश्वास हो गया और वह- रहस्य के कार्यों में शामिल किया जाने लगा। जब मोतीबाई को ही पीरअली पर सन्देह न रहा तब रानी को सन्देह हो ही क्यो सकता था ? पीरअली ने नवाब साहब के पास भाडेर समाचार भेज दिया और कहला भेजा कि अब बहुत समय तक कोई खबर न मिल सकेगी। पीरअली भयानक खेल खेल रहा था। जिस दिन पीरअली लौटकर आया उसी दिन राहतगढ के भागे हुये लगभग पाच सौ पठान रानी के शरणार्थी हुये। रानी ने उनको नौकर रख लिया। उनके एक सरदार का नाम गुलमुहम्मद था। इन लोगो का समाचार पीरअली ने रोज को नही भेज पाया और इस बात का उसको खेद था।
३४४ झाँसी की रानी रानी के पास जब ये पठान आये तब वे बडी हीन अवस्था में थे। कपडे सब फट गये थे। न जाने कितने दिन से उनको भरपेट भोजन न मिला था। अच्छे हथियार पास न थे। कुछ के पास तो सिवाय लाठी या छुरी के और कुछ न था। रानी ने उनको सब प्रकार की सुविधाये दी। उन्होने प्रण किया, 'स्वराज्य के लिये रानी के कदमो में अपने सबके सिर देगे।' इन पठानो ने अपने प्रण को जैसा निभाया उसको इतिहास जानता है और झासी की लोक परम्परा उसको नही भूली और न कभी भूलेगी। पीरअली को कुछ पठान मिले। उसने पूछा , 'तुम्हारा कौन मुल्क है खान ?' 'झासी अमारा मुलक है बाबा, तुम्हारा मुलक ?' 'मैं झासी का ही रहने वाला हूँ।' 'तब अम तुम बाई बाई हे बाबा ।, 'बाईसाहब का राज्य है खान' 'बेशक हे। और हमारा तुम्हारा बी।' झासी नगर के कोट के सब फाटको पर बडी और छोटी तोपो का उचित प्रबन्ध कर दिया गया। बारूद और गोले फाटको की बुर्जो में इकट्ठे कर दिये गये और निरन्तर युद्ध सामग्री तथा रसद भेजने का प्रबन्ध कर दिया गया। फसीलो के छेद्रो मे से बन्दूको की मार का काम जिन सिपाहियो को दिया गया, उनकी तथा उनके अफसरो की उत्कृष्ट व्यवस्था करली गई। सबसे बडी बात यह हुई कि एक स्थान से दूसरे स्थान को और सब स्थानो से रानी के पास तथा उनके पास से सब स्थानो सब मोर्चों को तुरन्त समाचार और आज्ञाये भेजने का बहुत अच्छा बन्दोबस्त कर लिया गया। ऐसा विश्वास था कि रोज दक्षिण की ओर से आ गया, इसलिये सागर-खिडकी, ओर्छा फाटक और सैयर फाटक का खास इन्तजाम किया गया। दीवान दूल्हाजू ओर्छा फाटक पर, पीरअली सागर खिडकी पर, कुंवर खुदाबख्श सैयर फाटक पर, कुंवर सागरसिंह , खंडेराव फाटक पर,
लक्ष्मीबाई ३४५ पूरन कोरी उनाव फाटक पर नियुक्त किये गये। दीवान जवाहरसिंह के हाथ में सम्पूर्ण नगर और नगर के फाटकों की रक्षा का भार सौंपा गया। किले में हर बुर्ज पर सब मिलाकर इक्यावन बडी बडी तोपे साजी सँभाली गईं। दक्षिणी बुर्ज की तोपे गुलाम गौसखां के सञ्चालन में, पूर्व और उत्तर की तोपे भाऊ बख्शी के हाथ में और पश्चिम की तोपे दीवान रघुनाथसिंह के अधिकार में दी गईं। किले में पठान, चुने हुये बुन्देलखण्डी सैनिक और रानी की स्त्री सेना की नियुक्त कर दी गई। सब सैनिक लगभग चार हजार होगे। पानी का प्रबन्ध बहुत अच्छा न था, परन्तु सन्तोषप्रद था—किले के पश्चिमी भाग में—शंकरगढ में जहा महादेव जी का मन्दिर है—एक कुआँ था उसी से सारी सेना को पानी पिलाने के लिये ब्राह्मण नियुक्त कर दिये गये। चैत की अमावस हो गई। नवरात्र का आरम्भ हुआ। किले में गौर की स्थापना हुई। रानी ने धूमधाम के साथ सिन्दूरोत्सव मनाया। गौर के सामने चांदी ही चांदी के बर्तनो की तड़क भड़क और मन्दिर के बाहर सबके लिये भीगे चने और बताशो का प्रसाद। नगर की स्त्रिया सजधज के साथ उत्सव में शरीक हुई। फूलो की सुन्दरता और सुगन्धि से महादेव जी का मन्दिर भर गया। स्त्रिया थोडी देर के लिये आने वाली विपत्ति को भूल गईं। वे अपने किले में थी, अपनी हँसती-मुस्कराती रानी के पास। उनकी तोपे, उनके गोलन्दाज, उनके सिपाही आसपास और अपनी रक्षा का पुख्ता हौसला अपने मन में। फिर किस बात की चिन्ता थी? महादेव जी के मन्दिर के समीप पलाश का एक वृक्ष था। उसमें इन दिनो प्रति वर्ष बडे बडे लाल फूल लगते थे और तीक्ष्ण ग्रीष्म ऋतु में उसके हरे चिकने बडे पत्ते छाया दिया करते थे। जङ्गल का अवशेष और स्मारक, महादेव के मन्दिर का अकेला पडौसी-वह वृक्ष काटने से बचा दिया गया था। नवरात्र में वह पलाश लाल फूलो से गस गया। स्त्रिया फूलो की एक एक माला उसकी भी डालो को पहिना दे रही थी।
३४६ झाँसी की रानी मानो सौन्दर्य को सुगन्धि प्रदान की गई हो। लाल फूलो पर बेला, 'चमेली, गेंदा और जूही की-रगबिरंगी मालाएँ ऐसी लगती थी जैसे प्रभात के समय ऊषा की किरणो ने गुलाल बिखेर दी हो। इस वृक्ष के नीचे कुआ था और कुएँ के ऊपर एक बारहदरी । इस बारहदरी की रक्षा के लिये ऊँचा परकोटा था। इसके पूर्व में बहुत ऊँचाई पर किले की पश्चिमी बुर्ज और उसके पीछे जरा दूर महल । पूजन के पश्चात स्त्रिया पलाश के वृक्ष के पास से सीढ़ियो द्वारा बारहदारी में इकट्ठी हो हो जा रही थी। रानी वही थी, । वही सिन्दूरोत्सव हो रहा था—हल्दी कूँ कूँ । रानी विधवा थी, इसलिये वह स्वयं सिन्दूर नही दे रही थी, परन्तु वहा भाऊ बख्शी की पत्नी थी और भी अनेक सधवाये थी, जो आपस मे सिन्दूर दे रही थी और किसी न किसी बहाने एक दूसरे के पति का नाम लिवाने का हंस हस कर प्रयत्न कर रही थी । मोतीबाई ने भाऊ बख्शी की पत्नी से कहा, 'तुम अपने देवर को क्या कहकर'पुकारोगी ?' बख्शिन—मेरे देवर हैं ही नही । मोतीबाई—'होता, तो बख्शिनजू उसको कैसे पुकारती?' बख्शिन—'लाला कहती ।' रानी—'और बुन्देलखण्ड में लाला के लिये दूसरा शब्द क्या है ?' बख्शिन—'सरकार, भउआ ।' सब हँस पडी । बख्शिन ने क्रोध में मुद्रा बनाकर कहा, 'महारानी साहब की सहायता से हरा लिया, नही तो मै इतना छकाती कि ये सब याद करती ।' रानी बोली, 'तुम इन सबके लिये अकेली ही बहुत हो ।' बख्शिन मोतीबाई के पीछे पड गई । उसे पकड़कर अकेले में ले गई । बख्शिन—'बतलाओ'भगवान का दूसरा नाम क्या है ?' मोतीबाई—'राम, कृष्ण, मुरारी, परमात्मा, अल्लाह ।' बख्शिन—'ओर, ओर ?'
लक्ष्मीबाई ४७ मोतीबाई—'दयासागर, परिवरदिगार, रहीम...।' बखिशन—'मैं तुम्हारा मुँह मीड दूँगी। बतलाओ वह नाम जिसको मुसलमान लोग दिनरात जपते हैं, नही तो तुम्हारी गत बनाऊँगी।' मीतीबाई ने धीरे से कहा, 'खुदा।' बखिशन ने उसका सिर पकडकर कन्धे से लगा लिया।- बोली, खुदा से दूर हो या उसके पास ?' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'दूर हूँ दीदी। यदि अच्छे दिन आये तो ब्याह करूंगी।' रानी के सामने आने को थी कि मोतीबाई ने बखिशन से कहा, जूही से कुछ मत पूछना। वह सरदार तात्या टोपे को प्राण दिये बैठी है, पर उन्होने आज तक प्यार की दो बाते भी उससे नही की।' 'नही पूछूंगी', बखिशन ने आश्वासन दिया। रानी समझ लिया। छेड़छाड़ नही की। झलकारी नही आई थी। रानी ने उसको बुलवाया। उसने आते ही रानी के पैर पकड लिये। रानी ने कहा, 'मैंने इसके लिये नही बुलाया था। तू हरसाल आती थी। इस साल अब तक क्यो नही आई ?' 'सरकार', झलकारी ने उत्तर दिया, 'मोसें अपराध हो गयो हतो।' रानी बोली, 'कोई अपराध नही हुआ।' झलकारी—'बछिया घायल तौ हो गई ती।' रानी—'हो गई होगी। मरी तो नही—बच गई।' झलकारी—'सरकार ने मोय और मोरे आदमी खों बचा लओ, नई तर कऊँ ठिकानो न हतो।' रानी—'तुम्हारे आदमी का नाम भूल गई उसको क्या कहते है ?' झलकारी—'ऊँ...ऊँ...।' रानी—'ऊँ ऊँ भी कोई नाम होता है ?' बखिशन ने कहा, 'सरकार, इससे बुन्देलखण्डी बोली में बोले।'
३४८ झाँसी की रानी मोतीबाई ने आग्रह किया, सरकार के मुँह से यहां की बोली बहुत अच्छी लगती है।' जूही ने अनुरोध किया । सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई भी पीछे पड गईँ । मुन्दर बोली, 'सरकार बुन्देलखण्डो में बोले तो यह अवश्य अपने पति का नाम बतला देगी। बतलाओगी न झलकारी ? बतला देना भला, नही तो हम लोगो की बात बिगड जायगी।' झलकारी ने उस बारहदरी के वातावरण को परिहास, सौन्दर्य, सुगन्धि और आग्रह से भरा पाया-उसने हामी का सिर झुकाया । रानी ने कहा,'तोरे घर वारे को का नाओ भलकारी ?' झलकारी—'हओ ऐसे सूदऊँ बताओ जात कऊँ ?' रानी—'तौ कैसे बताये पनमेसरी ?' झलकारी—'मोए कौनऊँ धोको देओ। जैसे एक बेर पूँछी हती तैसैं पूँछो अपुन ।' रानी—'आज कौन मिती है ?' झलकारी—'पाँचै महाराज ।' रानी—'दस दिन पाँछै का हुये ?' झलकारी—'पूनै ।' रानी हँस पडी । उन्होने फूलो की एक माला झलकारी के गले में डाली । सिर पर हाथ फेरा । विनोद की समाप्ति पर सब स्त्रिया महादेव के मन्दिर के पास उतर आईं । उतरती जाती थी और पलाश के पेड को हिलाती जाती थी । उसके लाल फूल मालाओ समेत झूम झूम जाते थे । महादेव का मन्दिर छोटा सा है और आसपास का-आगन भी सकरा ही है, परन्तु उसमें बहुत स्त्रिया इकट्ठी थी । चहल पहल को बन्द करके रानी ने स्त्रियो से कहा,'दो चार दिन के भीतर ही अपनी झासी के ऊपर गोरो का प्रहार होने वाला है। तुममें
लक्ष्मीबाई ३४६ से अनेक युद्ध विद्या सीख गई हो। जो जिस कार्य को कर सके वह उस कार्य को हाथ मे ले। लडने वालो के पास गोला, बारूद, खाना पानी इत्यादि ठीक समय पर पहुँचता रहना चाहिये। आवश्यकता पडने पर हथियार भी चलाना पडेगा। तुममें से कोई मेरी बहिन के बराबर हो, कोई माता के समान। अपने बाप की, अपने ससुर की, अपने पति की अपने भाई की लाज तुम्हारे हाथ है। ऐसे काम करना जिसमें अपने पुरखो को कीर्ति मिले। मैंने नगर का प्रबन्ध कर दिया है। तुम्हारी आवश्यकता मुझको किले में है। मेरे साथ रहना। बीच बीच में छुट्टी मिल जाया करेगी, तब घर हो आया करो।' झलकारी बोली, 'मैं सरकार अपने आदमी के पासइ रैहो। अपुन ने उनाव, फाटक की तोप उनखो सौपी है।' रानी ने मुस्कराकर कहा, 'ऐसोइ हुइहै झलकारी। अपने आदमी के पास रहियो, पै ऊको नाओ तो बताओ।' झलकारी घू घट काढ कर बोली, 'हू—अबईं तो बताओ तो।' सब स्त्रिया हँस पडी। रानी ने कहा, 'अब एक बार सब भगवान का नाम लो, 'हर हर महादेव।' सब स्त्रियो के कंठ से ध्वनित हुआ, 'हर हर महादेव।' उन कोमल, किन्तु दृढ कठो का वह निनाद किले की कठोर दीवालो से जा टकराया। उसकी भाई महादेव के मन्दिर में लौट पड़ी। हुआ 'हर हर महादेव' अनन्त दिशाओ में, अनन्त काल में वह अनन्त, अमर नाद समा गया। महल के पास सिपाहियो के कोठे थे। उनमें नवागन्तुक पठान भी थे। हल्ले को सुनकर हथियार लेकर बाहर निकल आये। बुन्देलखण्डी सिपाहियो ने उस हल्ले का उनको सविस्तार अर्थ समझाया।
३५० झांसी की रानी उनका अगुआ गुलमुहम्मद बोला, 'बाई जहां की औरत लडने को ऐसा तैयार है, वहा का मरद तो आसपास को चक्कर खिला देगा । और हम लोग—हम लोग—खुदाकसम—इस मुलक के लिये सब मर मिटेगा । वकत आने दो, बाई वक़्त !' पठानो ने दात मीसकर मन ही मन प्रण किया ।
लक्ष्मीबाई ३५१ [ ६७ ] जनरल रोज़ ससैन्य २० मार्च के सबेरे झासी के पूर्व दक्षिण कामासिन देवी की टौरिया के पीछे, झासी से लगभग तीन मील के फासले पर आ गया । थोडी देर में तम्बू तन गये । इन तम्बुओ को रानी ने किले के महल की छत पर से दूरबीन द्वारा देखा । झासी भर में सनसनी फैल गई, परन्तु वह सनसनी भय की न थी, उत्साह की थी । किले के गोलन्दाज़ो ने भी दूरबीन लगाई । तोपो पर पलीते डालने के लिये हाथ सुरसुरा उठे, परन्तु उस समय की तोपो के लिये अच्छा निशाना मारने के प्रसङ्ग में तीन मील का फासला बहुत था । स्त्री गोलन्दाज़ो ने भी दूरबीन पकडी । मोतीबाई ने उमग के साथ रानी से का, 'सवारो का हमला कर दिया जाय तो सब तम्बू कनातें तितर बितर हो जायँ ।' रानी बोली, 'समझ से काम लो । इन तम्बुओ के बीच में अगल बगल और आगे पीछे तोपें लगी होगी । एक सवार भी लौट कर न आ सकेगा । लडाई किले और परकोटे के भीतर से लडनी पडेगी । घिर जायँगे । परन्तु एक तात्या टोपे राव साहब की सेना लेकर आजावेगे । तब रोज़ की सेना पर दुहरी मार पडेगी ।' 'राव साहब के पास सदेशा भिजवा दिया गया ?' 'आज ही भेजती हू ।' 'पीरअली के हाथ न भेजा जाय । न जाने मन क्यो नही बोलता ।' 'सोचती हूँ किसको भेजूं ।' रानी ने कुछ क्षण सोचकर कहा, 'तू बतला मोती किसको भेजूं ।' मोतीबाई बोली, जो नाम मन में उठते हैं, वे सब किसी न किसी काम पर लिख लिये गये हैं । मैं सोचती हू जूही को सवार के साथ भेज दिया जाय ।' 'वह सुकुमार है, कोमल है,' रानी ने कहा ।
३५२ झांसी की रानी मोतीबाई ने सतृष्ण नेत्रो से रानी की ओर देखा । बोली, 'सरकार संसार की जितनी मंजुलता, है वह हमारे मालिक में निहित है। उनसे बढ़कर कोई नही । इतनी मृदुल होते हुये भी वे फौलाद से भी बढकर कठोर हैं । तब उनकी चाकरनी क्या सवाद वाहक का भी काम न कर सकेगी ? और फिर वह दृढ भी काफी है । इस कार्य मे उसका मन लगेगा । उसीको भेजने की अनुमति दी जाय । उसको तुरन्त शहर छोड़ देना चाहिये । अङ्गरेज लोग शीघ्र घेरा डालेगे । सब फाटक बन्द होने ही वाले हैं । फिर कोई भी न आ-जा सकेगा ।' रानी ने स्वीकृति दे दी । 'कहा, 'मै जूही को भेजने की अनुमतिदेती हू । उसके साथ काशी को भेजना चाहती हूँ । तुमको उसके साथ कर देती, परन्तु तुम्हारी यहा अधिक आवश्यकता पडेगी ।' रानी ने काशी और जूही को उसी समय कालपी के लिये रवाना कर दिया उन दोनो के घोडे अच्छे थे । जरूरी सामान साथ था । दोनो सशस्त्र युवा के वेश में गईं । काशीबाई और जूही के चले जाने पर नगर के सब फाटक बन्द कर लिये गये । झासी की — अनेक स्त्रियो ने उसी दिन रानी के पास सैनिक वेश मे अपना निवास बनाया । ये ही स्त्रिया जो घर पर बात में चबड चबड किया करती थी, जरा सा कारण पाने पर परस्पर लड बैठती थी, सध्या के समय वस्त्राभूषणो और फूलो से सुसजित होकर, थालो में दिये रख रख कर, मन्दिरो मे पूजन के लिये जाती थी, वे ही स्त्रिया सैनिक वेश में, तलवार बाधे और बन्दूक कन्धे पर साधे, चुपचाप अपना अपना कर्त्तव्य पालन करने में निरत हो गईं । उनका श्रृङ्गार और वाक् युद्ध—सब- तलवार के म्यान में समा गया । लोगो की कल्पना थी कि अङ्गरेज रात को झासी पर हमला करेगे । झासी सचेत थी, परन्तु रात को हमला नही हुआ ।
लक्ष्मीबाई ३५३ २१ मार्च को जनरल रोज़ ने अपने मातहत दलपतियों के साथ दूर से झासी का चक्कर क टा ओर भूमि का सूक्ष्म निरीक्षण किया। आक्रमण और रक्षा के स्थान में सेना की टुकडिया और तोपे लगा दी। शहर और किले के भीतर के लोगो को जिन जिन मार्गों से सहायता या रसद मिल सकती थी उन सबको उसने अपने अधीन कर लिया। शहर के सब फाटको की नाकेबन्दी करली। उसी दिन चन्देरी से ब्रिगेडियर स्टुअर्ट अपने दस्ते के साथ लौट आया। रोज़ को और बल मिला। जहा जहा अङ्गरेज फौज के दल लगाये गये थे वहा वहा उनकी रक्षा के लिये खाइया खोद ली गईं। एक स्थान से दूसरे स्थान तक तार लगा दिया गया। कामासिन टौरिया पर एक बडी दूरबीन लगाई गई और तार घर क़ायम किया गया। बात की बात में युद्धक्षेत्र के एक स्थल से दूसरे स्थल को समाचार भेजने की पूरी सुविधा हो गई, और दूरबीन से देखने योग्य किले का सब हाल मालूम करना भी सुलभ कर लिया गया। झासी के आसपास की सब टौरियो की आड से अङ्गरेजी तोपखाने मृत्यु वमन करने के लिये वैज्ञानिक तौर पर सन्नद्ध हो गये और टौरियो के बीच बीच मे जो नीची जगह और खाइया थी उनमें बन्दूक चलाने के लिये छेद और नालिया बनाकर, सैनिक अपने जनरल की आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगे। रोज़ जैसा योग्य सेनापति था, सेना उसकी उतनी ही सीखी सिखाई हिंसामय और अनुभवी थी। दूसरे दिन (२२ मार्च को) रोज़ के बीस पच्चीस घुडसवार निरीक्षण के लिये कोट के कुछ अधिक निकट आ गये। सैयर फाटक के पास दाहनी ओर जहा ऊँची मटीली टौरिया कोट के बाहर और भीतर हैं। यहा से उन घुडसवारो के ऊपर तडातड गोलियो की वर्षा हुई। मरा तो उनमें से कोई नही, परन्तु घायल अनेक हो गये। रोज़ को तुरन्त समाचार मिल गया। उसने समझ लिया कि झाँसी कड़ा मुकाबला करने के लिये तैयार है। रोज़ ने उसी दिन झाँसी पर धावा नही बोला। अपने सम्पूर्ण साधनो
३५४ झांसी की रानी और उपकरणो का फिर से निरीक्षण किया जहां जो त्रुटि पाई,उसको सभाला । मंगलवार ( २३ मार्च ) को रोज ने हमले की आज्ञा दी । युद्ध आरम्भ हो गया । सैयर-फाटक की बाईं तरफ एक टेक पर अङ्गरेज़ो का तोपखाना था । वहा से सैंयर-फाटक और ओर्छा-फाटक पर तथा उन फाटको के बीच की दीवार पर गोलो की बरसा हुई । चलते हुये गोलो की चादर के नीचे गोरी पलटन संगीनी बन्दूके लिये दीमक की तरह चली । खुदाबख्श और दूल्हाजू ने उनको बढने दिया । जब मार के काफी भीतर आ गये तब उन्होने कहर को मानो उड़ेल दिया । गोरी पलटन धरती में बिछ गई और फिर खुदाबख्श ने टेक के तोपखाने को अपना लक्ष्य बनाया । अङ्गरेज तोपची मारे गये और तोपो का मुँह बन्द हो गया । तोपखाने के पीछेवाली सेना पीछे को भागी । उसके ऊपर गुलामगोस ने 'घनगरज' की मार फेकी । मुश्किल से कुछ आदमी बचकर रोज के पास तक पहुँच पाये । पूर्व की ओर से भी सागर-खिडकी और लक्ष्मी-फाटक पर हमला होता हुआ दिखा, परन्तु उसकी गति धीमी थी—लक्ष्मीताल के दक्षिणी सिरे का छोटा सा चक्कर देना पडा, परन्तु भाऊ बख्शी की 'कड़कबिजली' ने पूर्व का मोर्चा ऐसा साध रक्खा था कि पूर्व की ओर से आक्रमण करने की रोज को साध मनमें ही समा गई । रोज ने किले के दक्षिण में, जीवनशाह की टौरिया के ठीक बगल में—पूर्व की ओर—किले से तीन सौ गज के फासले पर मोर्चा बनाया, परन्तु इस मोर्चे के बनाने में उसको काफी समय और आदमी खर्च करने पडे । सध्या तक वह बहुत कम काम कर पाया । रात मे मोर्चा बनकर तैयार हो गया । इसके सिवाय रोज ने इस मोर्चे की सहायता के लिये तीन नये मोर्चे और बनाये ।
लक्ष्मीबाई ३५५ [ ६८ ] झासी के तोपची और सिपाही रात भर जागते रहे। रानी ने दुहरी कुमुक का प्रबन्ध किया। दिन में अपनी अपनी जगह पर गुलाम गौस, खुदाबख्श, रघुनाथसिंह, भाऊ बख्शी, दूल्हाजू, पूरन और सागरसिंह, रात में उनके स्थानापन्न, रानी के स्त्री गोलन्दाज। परन्तु यह बदली सुबह होते ही नही हुई। झिङ्गा इन गोलन्दाजो के पास पहुँच गई और काम में मदद करती रही। दोपहर के उपरान्त बदलो होनी थी। गुलाम गौस रात भर का जागा था, जो स्त्री उसके पास काम कर रही थी, उससे गौस का मन नही भर रहा था। उसने उसके बदले में लालता ब्राह्मण को मागा। रानी ने लालता को भेज दिया। लालता के आते ही गौस की खुमारी चली गई। गौस ने उससे कहा, 'रानी साहब की स्त्री-गोलन्दाज चपल बहुत हैं, मुझको ठण्डा आदमी चाहिये जो काम करने के समय गाता न हो।' लालता हँसकर बोला, 'कभी कभी आल्हा गाते गाते तो मै भी काम करता हू खा साहब।' 'तब वह गीत याद रखना पण्डित जी', गौस ने कहा 'जननी जनम दियो है तोखो बस आजहि के लाने।' लालता ने फसील के छेद में होकर देखा कि जीवनशाह की पहाड़ी की आड में होकर बगल वाली टौरियो के पीछे कुछ तोपे और चढाई जा रही हैं। गुलाम गौस ने भी देखा। गौस की आख एक पल के लिये गीध की आख की तरह सधी। बोला, 'पडित जी, एक लोटा जल पिलाओ और मेरी घनगरज तोप और उसकी छोटी बहिनो का काम देखो। मै बारह बजे छुट्टी लूँगा। खुदा ने चाहा तो खाना-वाना खाने के बाद शाम को मिलूँगा। फिर रात को सोऊँगा। हा तो एक बार वह गीत तो मन से गादो। एक सतर से ज्यादा नही।
३५६ झाँसी की रानी ललता ने स्वर में गाया, 'जननी जनम दियो है तोखो बस आजहि के लाने।' गीत की समाप्ति हुई कि गौस ने तोपखाने को पलीता छुलाया 'घनगरज और उसकी छोटी बहिनो' ने इतनी जोर की गरज की कि जिमीन काँप गई । दक्षिणी सिरे की सब बुर्जों से एक एक क्षण के बाद बाढ दगना शुरू हो गई । तोपो के भरने का उत्कृष्ट प्रबन्ध था । एक तोपखाने की बाढ और दूसरे की बाढ के दगने मे थोडा ही अन्तर पडता था । रोज के तोपखानो ने जवाब दिया, परन्तु जवाब कमजोर था । गौस के तोपखानो ने ऐसी मार बरसाई कि रोज़ का दम फूल उठा । उसका दक्षिणी दस्ता नष्ट भ्रष्ट हो गया । कुछ तोपखाने बन्द हो गये, परन्तु एक तोपखाना कोलाहल कर रहा था । समय लगभग दोपहर का हो गया था । गुलाम गौस ने कहा 'मुझे भूख लग रही है और गोरो का यह तोपखाना मानता नही। अच्छा देखता हूँ ।' गुलाम गौस ने 'घनगरज' को एक अंगुल इधर उधर सरकाया । निशाना बाधा और एक फटने वाला गोला छोडा । बारूदे इन तोपो की ऐसी थी कि धुश्रा न होता था, इसलिये गौस ने अपने निशाने की सफलता तुरन्त देखी । उछल कर बोला, 'वह मारा।' उसके साथियो ने देखा कि गोरे तोपची मारे गये और तोप भी उलट कर बेकार हो गई । अङ्गरेजो का दक्षिणी मीर्चा बिलकुल ठण्डा हो गया । गौस भोजन और आराम के लिये चला गया । लालता ने स्थान पकडा । पूर्व की ओर से अङ्गरेजी तोपो के गोले आने लगे । कुछ किले से टकराते थे और कुछ शहर में गिरकर घरो का और लोगो का नाश करते थे । भाऊ बख्शी ने कडकबिजली का स्थान ज़रासा परिवर्तित किया और निशाना साधकर पलीता दिया । थोडी देर में रोज का पूर्वीय मोर्चा भी ठंडा हो गया । तोपची मारे गये और तोपे बेकार हो गईं । बख्शी अपनी पत्नी को तोपखाना सौप कर भोजन और आराम के लिये चला गया ।
लक्ष्मीबाई ३५७ मुन्दर ने रघुनाथसिंह की जगह ली। सुन्दर ने दूल्हाजू की, मोतीबाई ने खुदाबख्श की। दीवान जवाहरसिंह को थोड़ी देर के लिये छुट्टी देदी गई। रानी घोड़े पर सवार होकर शहर के सब मोर्चों को देखने और सँभालने के लिये चली गई । तीसरे पहर के अन्त में लौट आईं। जवाहरसिंह फिर अपने काम पर डट गया। चौथे पहर से लेकर सन्ध्या तक स्त्री तोपचियो ने दृढ़तापूर्वक काम किया। रात को भी उन्हीं को काम पर रहना था। केवल खंडेराव फाटक और सागर खिड़की पर स्त्रियां काम नहीं कर रही थीं। खंडेराव फाटक पर सागरसिंह ने अपना नायब स्वयं चुन लिया और सागर खिड़की पर बरहामुद्दीन नामका एक बुन्देलखण्ड पठान भेज दिया गया। इसका आना पीरअली को अच्छा नहीं लगा। पीरअली ने कहा, 'खांसाहब आपको नाहक कष्ट दिया गया। मैं तो दिन रात इस छोटी सी खिड़की को सँभालने को तैयार हूँ।' 'मीरसाहब,' बरहामुद्दीन बोला, 'आप थोड़ा आराम करलें, रात भर के जागे हुये हैं।' 'गई रात तो सभी जागे हैं। आप भी तो न सोये होगे ?' 'हुकुम है। पालन करना होगा।' 'ऐसा भी क्या ! अरे साहब सोइये। कल रहियेगा मेरी मदद पर।' 'नहीं, जनरल साहब सुनेंगे तो नाराज़ होंगे। और रानी साहब सुनेंगी तो मैं अपना मुँह ही न दिखा सकूँगा।' 'तो रह जाइये, मगर एक बात है—किसी को मालूम न हो।' 'मुझे किस्से कहानी कहते फिरने से मतलब ही क्या ?' 'बात ऐसी है कि अगर फूटकर बाहर निकल जाय तो मेरे टुकड़े हो जायेंगे।' 'आप कहिये। विश्वास करिये।' अङ्गरेजी छावनी में क्या हो रहा है, क्या होने वाला है, कहा कहा नए मोर्चे बनाये गये और किस तरह से हमला जोर का होगा इन बातो की
३५८ झाँसी की रानी जासूसी करने का भार मेरे सिर है। अङ्गरेजी छावनी में भोपाल रियासत के भी सिपाही हैं। उनमें से एक मेरा रिश्तेदार है। जब मै थोड़े दिन हुए तालबेहट की ओर गया था तब उसको मैने मिला लिया था। वह कुछ और लोगो से मिला हुआ है, इसलिये ठीक ठीक खबर मिल जायगी। वह खबर अपने बडे काम की होगी। इस खबर के लाने के लिये मैं रात को चुपचाप बाहर जाऊँगा। सबेरे के बहुत पहले आ जाऊँगा। यदि अङ्गरेजो को खबर लग गई, तो मे मार दिया जाऊँगा और अङ्गरजी फौज में मेरा जो रिश्तेदार है, वह, और उसके साथी, सब मारे जायगे। रानी साहब का नुकसान होगा।' 'मै किसी से न कहूँगा, मगर मै चला जाऊँ या सो जाऊँ तो आपके ठौर खाली हो जायगा। फिर यदि दुश्मन यहा होकर रात में धावा बोलदे तो अपना कितना वडा नुकसान न होगा?' 'यह तो छोटी सी खिडकी है। इसकी खबर भी अङ्गरेजो को न होगी।' 'जैसा आप उचित समझे। मै सोचता हूँ, हर हालत मे मरा इस ठिये पर रहना आपके लिये लाभ दायक होगा।' 'खूब। आप रहिये। मगर जब सब लोग सो जायगे तब मै जाऊ गा।' 'लेकिन फाटक नही खोलना चाहिये।' 'फाटक पर ताले पड़े हैं। मै मुहरी के रास्ते जाऊ गा।' 'मुहरी। कौन सी मुहरी?' 'वही जो खिडकी के बगल मे है?' जब सब सो गये पीरअली ने बरहामुद्दीन को मोहरी दिखलाई और उसी में होकर बाहर चला गया। आध मील चलने के उपरान्त वह अङ्गरेजी छावनी के पास पहुँचा। टोका गया। उसने पूर्व निश्चित सकेत को कहा। सन्त्री ने आगे बढने दिया। कई अड्डो पर रोका जाने और अनुमति पाने पर पीरअली रोज और उसके मातहत दलनायको के सामने पहुँचा, दुभाषिये के द्वारा तुरन्त बातचीत हुई।
लक्ष्मी बाई ३५६ रोज़— किले में से जो गोलाबारी हुई,उसका प्रधान नायक कौन है ?' पीरअली—'गुलाम गौसखा और भाऊ बख्शी ।' रोज़ ने बागियो का रजिस्टर लोटवाया, पलटवाया । उसमें ये नाम न थे । रोज़—'ये लोग कौन है ?' पीरअली—'रानी साहब के नौकर हैं ।' रोज़—'ओर्च्छा फाटक और सैयर फाटक पर कौन हैं ?' पीरअली—'दीवान दूल्हाजू ओर्च्छा फाटक पर है और कुंवर खुदाबख्श सैयर फाटक पर ।' फिर रजिस्टर देखा गया । ये नाम भी न निकले । रोज़—'कोई लालता ब्राह्मण है ?' पीरअली—'है, किले में है ।' रोज़ ने दात पीसे । बोला, 'जनरल कौन है ?' पीरअली—'खुद रानी साहब । उनके नीचे दीवान जवाहरसिंह जागीरदार काम करते हैं ।' रोज़—'कुल कितने गोलन्दाज हैं ?' पीरअली—'बेहिसाब । सैकड़ो । बहुत तो औरतें गोलन्दाज हैं ।' रोज़—'बाई जोव ! स्टुअर्ट, यह भासी तो महज नरक (हैल) है । औरते गोलन्दाज ! कल दूरवीन से अच्छी तरह देखूँगा ।' स्टुअर्ट—'बारूद बनाने का कोई कारखाना है या पहले से बनी रक्खी हैं ?' पीरअली—'पहले की बनी रक्खी है और बनाने का कारखाना भी है ।' 'रोज़—'इट इज स्मोक लैस पाउडर स्टुअर्ट ( धुआँ न देने वाली बारूद है ! ) उत्तरी दरवाजे किसके सुपुर्द हैं ?'
३६० , झांसी की रानी पीरअली—ठाकुरो, काछियो और कोरियो के हाथ में। दतिया- फाटक तेलियो के हाथ में है।' रोज़—'दी होल पीपुल एगेन्स्ट अस (पूरी जनता हमारे खिलाफ है) अच्छा तुम किस जगह काम करते हो ?' पीरअली —'सागर खिडकी पर।' रोज़—'हमारे हवाले कर सकोगे !' पीरअली—'खुशी से, मगर आपको फायदा कुछ न होगा। सागर खिडकी की ठीक पीठ पर खजाञ्ची की कोठी है। उस पर तोपखाना है। वह मेरे काबू का नही है। वहां पठान और ठाकुर हैं।' रोज़—'कोई औरतें हाथ में आ सकती है ?' पीरअली—'तोबा, तोबा झासी की औरतें पूरी शैतान हैं। एक नाचने गाने वाली मेरी जान पहिचान की है, मगर वह जासूसी मुहकमें की प्रधान है और अब तोप चलाती है।' रोज़—'डैन्सिंग गर्ल ए गनर ! (नाचने वाली गोलन्दाज !) व्हाट एल्स हैव आई टु हियर इन दिस डैम्ड् एकर्सैड प्लेस (इस सत्यानासी पलीत जगह में मुझको अब और क्या सुनना बाकी रह गया है ?)। स्टुअर्ट—'मगर जासूसी मुहकमें का अफ़सर तो एक मोतीसाईं सुना गया था ?' पीरअली—'जी नही वह अफ़सर यही नाचने वाली है और उसका नाम मोतीबाई है।' वे सब हँस पडे। रोज़ ने कहा, 'वी हैव मैड फूल्स् आव अस ! (हम लोग वेवकूफ बन गये । ) अच्छा, किसी एक फाटक वाले से हमको मिलादो। तुमको और उसको बहुत इनाम मिलेगा।' पीरअली —'कोशिश करूंगा।' रोज़— तुम बतला सकते हो शहर और किले पर हमरी तोप का गोला कहा से अच्छा पड़ेगा ?'