झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३५५ [ ६८ ] झासी के तोपची और सिपाही रात भर जागते रहे। रानी ने दुहरी कुमुक का प्रबन्ध किया। दिन में अपनी अपनी जगह पर गुलाम गौस, खुदाबख्श, रघुनाथसिंह, भाऊ बख्शी, दूल्हाजू, पूरन और सागरसिंह, रात में उनके स्थानापन्न, रानी के स्त्री गोलन्दाज। परन्तु यह बदली सुबह होते ही नही हुई। झिङ्गा इन गोलन्दाजो के पास पहुँच गई और काम में मदद करती रही। दोपहर के उपरान्त बदलो होनी थी। गुलाम गौस रात भर का जागा था, जो स्त्री उसके पास काम कर रही थी, उससे गौस का मन नही भर रहा था। उसने उसके बदले में लालता ब्राह्मण को मागा। रानी ने लालता को भेज दिया। लालता के आते ही गौस की खुमारी चली गई। गौस ने उससे कहा, 'रानी साहब की स्त्री-गोलन्दाज चपल बहुत हैं, मुझको ठण्डा आदमी चाहिये जो काम करने के समय गाता न हो।' लालता हँसकर बोला, 'कभी कभी आल्हा गाते गाते तो मै भी काम करता हू खा साहब।' 'तब वह गीत याद रखना पण्डित जी', गौस ने कहा 'जननी जनम दियो है तोखो बस आजहि के लाने।' लालता ने फसील के छेद में होकर देखा कि जीवनशाह की पहाड़ी की आड में होकर बगल वाली टौरियो के पीछे कुछ तोपे और चढाई जा रही हैं। गुलाम गौस ने भी देखा। गौस की आख एक पल के लिये गीध की आख की तरह सधी। बोला, 'पडित जी, एक लोटा जल पिलाओ और मेरी घनगरज तोप और उसकी छोटी बहिनो का काम देखो। मै बारह बजे छुट्टी लूँगा। खुदा ने चाहा तो खाना-वाना खाने के बाद शाम को मिलूँगा। फिर रात को सोऊँगा। हा तो एक बार वह गीत तो मन से गादो। एक सतर से ज्यादा नही।