भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३५४ झांसी की रानी और उपकरणो का फिर से निरीक्षण किया जहां जो त्रुटि पाई,उसको सभाला । मंगलवार ( २३ मार्च ) को रोज ने हमले की आज्ञा दी । युद्ध आरम्भ हो गया । सैयर-फाटक की बाईं तरफ एक टेक पर अङ्गरेज़ो का तोपखाना था । वहा से सैंयर-फाटक और ओर्छा-फाटक पर तथा उन फाटको के बीच की दीवार पर गोलो की बरसा हुई । चलते हुये गोलो की चादर के नीचे गोरी पलटन संगीनी बन्दूके लिये दीमक की तरह चली । खुदाबख्श और दूल्हाजू ने उनको बढने दिया । जब मार के काफी भीतर आ गये तब उन्होने कहर को मानो उड़ेल दिया । गोरी पलटन धरती में बिछ गई और फिर खुदाबख्श ने टेक के तोपखाने को अपना लक्ष्य बनाया । अङ्गरेज तोपची मारे गये और तोपो का मुँह बन्द हो गया । तोपखाने के पीछेवाली सेना पीछे को भागी । उसके ऊपर गुलामगोस ने 'घनगरज' की मार फेकी । मुश्किल से कुछ आदमी बचकर रोज के पास तक पहुँच पाये । पूर्व की ओर से भी सागर-खिडकी और लक्ष्मी-फाटक पर हमला होता हुआ दिखा, परन्तु उसकी गति धीमी थी—लक्ष्मीताल के दक्षिणी सिरे का छोटा सा चक्कर देना पडा, परन्तु भाऊ बख्शी की 'कड़कबिजली' ने पूर्व का मोर्चा ऐसा साध रक्खा था कि पूर्व की ओर से आक्रमण करने की रोज को साध मनमें ही समा गई । रोज ने किले के दक्षिण में, जीवनशाह की टौरिया के ठीक बगल में—पूर्व की ओर—किले से तीन सौ गज के फासले पर मोर्चा बनाया, परन्तु इस मोर्चे के बनाने में उसको काफी समय और आदमी खर्च करने पडे । सध्या तक वह बहुत कम काम कर पाया । रात मे मोर्चा बनकर तैयार हो गया । इसके सिवाय रोज ने इस मोर्चे की सहायता के लिये तीन नये मोर्चे और बनाये ।