भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 364

लक्ष्मीबाई ३५३ २१ मार्च को जनरल रोज़ ने अपने मातहत दलपतियों के साथ दूर से झासी का चक्कर क टा ओर भूमि का सूक्ष्म निरीक्षण किया। आक्रमण और रक्षा के स्थान में सेना की टुकडिया और तोपे लगा दी। शहर और किले के भीतर के लोगो को जिन जिन मार्गों से सहायता या रसद मिल सकती थी उन सबको उसने अपने अधीन कर लिया। शहर के सब फाटको की नाकेबन्दी करली। उसी दिन चन्देरी से ब्रिगेडियर स्टुअर्ट अपने दस्ते के साथ लौट आया। रोज़ को और बल मिला। जहा जहा अङ्गरेज फौज के दल लगाये गये थे वहा वहा उनकी रक्षा के लिये खाइया खोद ली गईं। एक स्थान से दूसरे स्थान तक तार लगा दिया गया। कामासिन टौरिया पर एक बडी दूरबीन लगाई गई और तार घर क़ायम किया गया। बात की बात में युद्धक्षेत्र के एक स्थल से दूसरे स्थल को समाचार भेजने की पूरी सुविधा हो गई, और दूरबीन से देखने योग्य किले का सब हाल मालूम करना भी सुलभ कर लिया गया। झासी के आसपास की सब टौरियो की आड से अङ्गरेजी तोपखाने मृत्यु वमन करने के लिये वैज्ञानिक तौर पर सन्नद्ध हो गये और टौरियो के बीच बीच मे जो नीची जगह और खाइया थी उनमें बन्दूक चलाने के लिये छेद और नालिया बनाकर, सैनिक अपने जनरल की आज्ञा की प्रतीक्षा करने लगे। रोज़ जैसा योग्य सेनापति था, सेना उसकी उतनी ही सीखी सिखाई हिंसामय और अनुभवी थी। दूसरे दिन (२२ मार्च को) रोज़ के बीस पच्चीस घुडसवार निरीक्षण के लिये कोट के कुछ अधिक निकट आ गये। सैयर फाटक के पास दाहनी ओर जहा ऊँची मटीली टौरिया कोट के बाहर और भीतर हैं। यहा से उन घुडसवारो के ऊपर तडातड गोलियो की वर्षा हुई। मरा तो उनमें से कोई नही, परन्तु घायल अनेक हो गये। रोज़ को तुरन्त समाचार मिल गया। उसने समझ लिया कि झाँसी कड़ा मुकाबला करने के लिये तैयार है। रोज़ ने उसी दिन झाँसी पर धावा नही बोला। अपने सम्पूर्ण साधनो

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास) · पृष्ठ 364, कुल 526 में से · BharatKosha