झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५२ झांसी की रानी मोतीबाई ने सतृष्ण नेत्रो से रानी की ओर देखा । बोली, 'सरकार संसार की जितनी मंजुलता, है वह हमारे मालिक में निहित है। उनसे बढ़कर कोई नही । इतनी मृदुल होते हुये भी वे फौलाद से भी बढकर कठोर हैं । तब उनकी चाकरनी क्या सवाद वाहक का भी काम न कर सकेगी ? और फिर वह दृढ भी काफी है । इस कार्य मे उसका मन लगेगा । उसीको भेजने की अनुमति दी जाय । उसको तुरन्त शहर छोड़ देना चाहिये । अङ्गरेज लोग शीघ्र घेरा डालेगे । सब फाटक बन्द होने ही वाले हैं । फिर कोई भी न आ-जा सकेगा ।' रानी ने स्वीकृति दे दी । 'कहा, 'मै जूही को भेजने की अनुमतिदेती हू । उसके साथ काशी को भेजना चाहती हूँ । तुमको उसके साथ कर देती, परन्तु तुम्हारी यहा अधिक आवश्यकता पडेगी ।' रानी ने काशी और जूही को उसी समय कालपी के लिये रवाना कर दिया उन दोनो के घोडे अच्छे थे । जरूरी सामान साथ था । दोनो सशस्त्र युवा के वेश में गईं । काशीबाई और जूही के चले जाने पर नगर के सब फाटक बन्द कर लिये गये । झासी की — अनेक स्त्रियो ने उसी दिन रानी के पास सैनिक वेश मे अपना निवास बनाया । ये ही स्त्रिया जो घर पर बात में चबड चबड किया करती थी, जरा सा कारण पाने पर परस्पर लड बैठती थी, सध्या के समय वस्त्राभूषणो और फूलो से सुसजित होकर, थालो में दिये रख रख कर, मन्दिरो मे पूजन के लिये जाती थी, वे ही स्त्रिया सैनिक वेश में, तलवार बाधे और बन्दूक कन्धे पर साधे, चुपचाप अपना अपना कर्त्तव्य पालन करने में निरत हो गईं । उनका श्रृङ्गार और वाक् युद्ध—सब- तलवार के म्यान में समा गया । लोगो की कल्पना थी कि अङ्गरेज रात को झासी पर हमला करेगे । झासी सचेत थी, परन्तु रात को हमला नही हुआ ।