झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३५१ [ ६७ ] जनरल रोज़ ससैन्य २० मार्च के सबेरे झासी के पूर्व दक्षिण कामासिन देवी की टौरिया के पीछे, झासी से लगभग तीन मील के फासले पर आ गया । थोडी देर में तम्बू तन गये । इन तम्बुओ को रानी ने किले के महल की छत पर से दूरबीन द्वारा देखा । झासी भर में सनसनी फैल गई, परन्तु वह सनसनी भय की न थी, उत्साह की थी । किले के गोलन्दाज़ो ने भी दूरबीन लगाई । तोपो पर पलीते डालने के लिये हाथ सुरसुरा उठे, परन्तु उस समय की तोपो के लिये अच्छा निशाना मारने के प्रसङ्ग में तीन मील का फासला बहुत था । स्त्री गोलन्दाज़ो ने भी दूरबीन पकडी । मोतीबाई ने उमग के साथ रानी से का, 'सवारो का हमला कर दिया जाय तो सब तम्बू कनातें तितर बितर हो जायँ ।' रानी बोली, 'समझ से काम लो । इन तम्बुओ के बीच में अगल बगल और आगे पीछे तोपें लगी होगी । एक सवार भी लौट कर न आ सकेगा । लडाई किले और परकोटे के भीतर से लडनी पडेगी । घिर जायँगे । परन्तु एक तात्या टोपे राव साहब की सेना लेकर आजावेगे । तब रोज़ की सेना पर दुहरी मार पडेगी ।' 'राव साहब के पास सदेशा भिजवा दिया गया ?' 'आज ही भेजती हू ।' 'पीरअली के हाथ न भेजा जाय । न जाने मन क्यो नही बोलता ।' 'सोचती हूँ किसको भेजूं ।' रानी ने कुछ क्षण सोचकर कहा, 'तू बतला मोती किसको भेजूं ।' मोतीबाई बोली, जो नाम मन में उठते हैं, वे सब किसी न किसी काम पर लिख लिये गये हैं । मैं सोचती हू जूही को सवार के साथ भेज दिया जाय ।' 'वह सुकुमार है, कोमल है,' रानी ने कहा ।