झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 369, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें३५८ झाँसी की रानी जासूसी करने का भार मेरे सिर है। अङ्गरेजी छावनी में भोपाल रियासत के भी सिपाही हैं। उनमें से एक मेरा रिश्तेदार है। जब मै थोड़े दिन हुए तालबेहट की ओर गया था तब उसको मैने मिला लिया था। वह कुछ और लोगो से मिला हुआ है, इसलिये ठीक ठीक खबर मिल जायगी। वह खबर अपने बडे काम की होगी। इस खबर के लाने के लिये मैं रात को चुपचाप बाहर जाऊँगा। सबेरे के बहुत पहले आ जाऊँगा। यदि अङ्गरेजो को खबर लग गई, तो मे मार दिया जाऊँगा और अङ्गरजी फौज में मेरा जो रिश्तेदार है, वह, और उसके साथी, सब मारे जायगे। रानी साहब का नुकसान होगा।' 'मै किसी से न कहूँगा, मगर मै चला जाऊँ या सो जाऊँ तो आपके ठौर खाली हो जायगा। फिर यदि दुश्मन यहा होकर रात में धावा बोलदे तो अपना कितना वडा नुकसान न होगा?' 'यह तो छोटी सी खिडकी है। इसकी खबर भी अङ्गरेजो को न होगी।' 'जैसा आप उचित समझे। मै सोचता हूँ, हर हालत मे मरा इस ठिये पर रहना आपके लिये लाभ दायक होगा।' 'खूब। आप रहिये। मगर जब सब लोग सो जायगे तब मै जाऊ गा।' 'लेकिन फाटक नही खोलना चाहिये।' 'फाटक पर ताले पड़े हैं। मै मुहरी के रास्ते जाऊ गा।' 'मुहरी। कौन सी मुहरी?' 'वही जो खिडकी के बगल मे है?' जब सब सो गये पीरअली ने बरहामुद्दीन को मोहरी दिखलाई और उसी में होकर बाहर चला गया। आध मील चलने के उपरान्त वह अङ्गरेजी छावनी के पास पहुँचा। टोका गया। उसने पूर्व निश्चित सकेत को कहा। सन्त्री ने आगे बढने दिया। कई अड्डो पर रोका जाने और अनुमति पाने पर पीरअली रोज और उसके मातहत दलनायको के सामने पहुँचा, दुभाषिये के द्वारा तुरन्त बातचीत हुई।