झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३५७ मुन्दर ने रघुनाथसिंह की जगह ली। सुन्दर ने दूल्हाजू की, मोतीबाई ने खुदाबख्श की। दीवान जवाहरसिंह को थोड़ी देर के लिये छुट्टी देदी गई। रानी घोड़े पर सवार होकर शहर के सब मोर्चों को देखने और सँभालने के लिये चली गई । तीसरे पहर के अन्त में लौट आईं। जवाहरसिंह फिर अपने काम पर डट गया। चौथे पहर से लेकर सन्ध्या तक स्त्री तोपचियो ने दृढ़तापूर्वक काम किया। रात को भी उन्हीं को काम पर रहना था। केवल खंडेराव फाटक और सागर खिड़की पर स्त्रियां काम नहीं कर रही थीं। खंडेराव फाटक पर सागरसिंह ने अपना नायब स्वयं चुन लिया और सागर खिड़की पर बरहामुद्दीन नामका एक बुन्देलखण्ड पठान भेज दिया गया। इसका आना पीरअली को अच्छा नहीं लगा। पीरअली ने कहा, 'खांसाहब आपको नाहक कष्ट दिया गया। मैं तो दिन रात इस छोटी सी खिड़की को सँभालने को तैयार हूँ।' 'मीरसाहब,' बरहामुद्दीन बोला, 'आप थोड़ा आराम करलें, रात भर के जागे हुये हैं।' 'गई रात तो सभी जागे हैं। आप भी तो न सोये होगे ?' 'हुकुम है। पालन करना होगा।' 'ऐसा भी क्या ! अरे साहब सोइये। कल रहियेगा मेरी मदद पर।' 'नहीं, जनरल साहब सुनेंगे तो नाराज़ होंगे। और रानी साहब सुनेंगी तो मैं अपना मुँह ही न दिखा सकूँगा।' 'तो रह जाइये, मगर एक बात है—किसी को मालूम न हो।' 'मुझे किस्से कहानी कहते फिरने से मतलब ही क्या ?' 'बात ऐसी है कि अगर फूटकर बाहर निकल जाय तो मेरे टुकड़े हो जायेंगे।' 'आप कहिये। विश्वास करिये।' अङ्गरेजी छावनी में क्या हो रहा है, क्या होने वाला है, कहा कहा नए मोर्चे बनाये गये और किस तरह से हमला जोर का होगा इन बातो की