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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 526 में से

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पृष्ठ 341

३३० झाँसी की रानी पूरन चिन्तित था । खोज करने के लिये निकला । यदि भेड मरी है तो उसका दाम दे दिया जावेगा, जाति में कुछ दण्ड लगेगा वह भुगत लेगा, परन्तु यदि बछिया मरी है या घायल हो गई है तो आयी महान् विपद । पूरन सोच रहा था । निशाने से उचट कर एक बछिया के पैर में गोली लगी थी । वह घायल हुई और गिर पडी । बछिया एक ब्राह्मण की थी । मशहूर हुआ कि बछिया मर गई-झलकारी ने मार डाली । वरेदी अपनी अनुपस्थिति अस्वीकृत करता था । उसने कहा, 'मेने झलकारी को गोली मारते अपनी आखो देखा है ।' शहर में रौरा मच गया । झलकारी कभी कभी रानी के पास जाती थी । रानी ने स्त्रियो की जो सेना बनाई थी, उसकी एक सिपाही झलकारी भी थी । सध्या समय साफ सुथरे और रंगीन कपडे पहिन कर थाली में दिये संवार कर, फूल सजाकर वह मन्दिर में पूजन के लिये आया करती थी और अपने गले में फूलो का हार डाले भी दिखलाई देती थी । अन्य जाति की स्त्रिया भी इस प्रकार की स्वतन्त्रता पाये हुई थी, परन्तु झलकारी की स्वतन्त्रता में एक ओज था-और वह ऊँची जाति वाले अनेक लोगो को खटकता था । 'झलकारी ने एक गरीब ब्राह्मण की बछिया मार डाली ।' 'अरे वह इतनी मस्ता गई है कि अपने पति तक की मारपीट करती है ।' 'वह अच्छो अच्छो को किसी गिनती में नही लेखती ।' इस प्रकार की स्त्रिया रानी साहब को बदनाम कर रही हैं ।' इत्यादि उद्गार बाजार में निसृत हो रहे थे । 'प्रायश्चित्त कराओ ।' 'गधे पर बिठाकर काला मुँह करो ।' 'जब तक प्रायश्चित्त न हो जाय तब तक कुआ, बाजार, पड़ोस सब बन्द रहे ।'

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