झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 340, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३२६ [ ६२ ] विकट ठंड । ऊपर से हड्डी कपाने वाली हवा । कुछ ही दिन पहले पानी बरस चुका था । ठिठुरी हुई घास के ऊपर बडे बडे ओसकण । मृदुल बाल-रवि की रश्मिया उनके ऊपर सरकती हुई । झलकारी कोरिन कन्धे पर बन्दूक रखे, बगल में बारूद और गोलियो का झोला लटकाये उनाव फाटक से बाहर हुई । जब हाथ ठिठुर जाते तब बन्दूक को बगल में दाब लेती और दोनो हाथ ओढनी में छिपा लेती । उनाव फाटक के उत्तर में एक टौरिया है, जिसको अञ्जनली की टौरिया कहते हैं । उसके दक्षिणी सिरे पर अंजनी और हनुमान का एक छोटा सा चबूतरा है । थोडी देर में झलकारी इसी चबूतरे के पास पहुची और धूप लेने लगी । ठंडी हवा और सूर्य की कोमल किरणे उसकी बड़ी वडी आखो को सुरमा सा लगाने लगी । जब दिन चढ आया तब वहा से जरा हटकर निशाना बाज़ी करने लगी । काफी समय तक करती रही । अञ्जनी की टौरिया की उपत्यका विषम थी । वहा ऐसे समय कोई आता जाता न था । लेकिन भेड बकरी और ढोर चरने के लिये आ निकलते थे । अकस्मात् झलकारी की गोली एक पशु को लगी । उसने ठीक तौर पर नही देख पाया कि गोली भेड को लगी या बछिया को । सन्देह था कि बछिया को लगी, परन्तु मन कहता था कि भेड को लगी होगी । वह बेतहाशा घर आई । पूरन घरू काम कर रहा था । झलकारी ने उसको अपनी घबराहट का कारण बतलाया । पूरन को हद दर्जे की खीझ हुई । बोला, 'तुमने जा तक न देखी कै बछिया हती कै भेड, और न काऊ से जा पूँछी कि की कौ ढोर हतौ ?' झलकारी ने खिसिया कर कहा, 'मैं उतै कीसैं पूछती ? उतै बरेदी तो हतोइ नई । बरेदी होतो तो ढोर उतैं कैसें आ जाते ?'