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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३२८ झांसी की रानी रहे थे। चार दिन घनघोर'युद्ध करने के वाद पठानो को किला छोडना पडा। राहतगढ से १५ मील पर वरोदिया का किला था। यहा वानपूर के राजा मर्दनसिंह के आश्रय में अङ्गरेज़ी फौज के कुछ विद्रोही थे। रोज़ ने इनको भी हरा दिया और फिर वह सागर की ओर बढा। पूर्व की ओर गढ़ाकोटा का क़िला पड़ता था। वह विप्लवकारियो के हाथ में था। उसको लेने के पहले रोज़ ने सागर पर चढ़ाई की। नर्मदा के उत्तरी किनारे का अधिकांश भूखण्ड विप्लवकारियो के हाथ में था। इसको अपने हाथ में किये विना जनरल रोज़ झांसी की ओर नही बढ सकता था। सागर और झांसी के बीच में बानपूर का राजा मर्दनसिंह और शाहगढ का राजा बखतबली लोहा लेने को तैयार थे। अङ्गरेज़ो का प्रधान सेनापति सर कालिन कैम्बेल था। वह उत्तराखंड के विप्लव के दमन मे सलग्न था। उसका मत था कि जब तक झांसी नही कुचली जाती, तब तक उत्तराखण्ड हाथ नहीं आता। इसलिये रोज़ सागर के द्वार से झांसी की ओर आ रहा था। बीच में ऊबड-खाबड भूमि और ऊबड-खाबड लड़ाकू जनसमूह। परन्तु रोज इत्यादि अगरेज़ जनरलो को विश्वास था—जहा विप्लवकारियो के नेता राजा, नवाब, जागीरदार मारे गये तही विप्लव समाप्त हो जायगा।