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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३२७ [ ६१ ] उत्तर और पूर्व में अङ्गरेजो की विजय-पराजय का क्रम चालू था। लखनऊ के पतन के उपरान्त उसका फिर उत्थान हुआ। शहर में, बगीचो-बारहदरियो में, महलो में युद्ध होता रहा। कानपुर के सूत्र को तात्या टोपे ने फिर पकडा। वह ग्वालिय रगया और वहा की अङ्गरेजो- हिन्दुस्थानी सेना को फोडकर अपने साथ ले आया और उसने अङ्गरेजो के जनरल विंढम को हराया। परन्तु अङ्गरेज़ सत्तरह सहस्र गोरी सेना, नौ सहस्र गोरखो और बहुसख्यक सिखो का दल लेकर लखनऊ पर पहुँच गये। विप्लवकारियो ने बहुत करारे युद्ध किये। उत्तर और पूर्व के युद्धो में तात्या टोपे ने बहुत भाग लिया। अन्त में जब बिठूर मिट गया और कानपुर अन्तिम बार अङ्गरेजो की अधीनता में चला गया, तब तात्या कालपी के आसपास से युद्ध करने लगा। शीत काल आ चुका था। बिहार और अवध में घोर लडाई जारी थी, परन्तु विप्लवकारियो में व्यवस्था न थी। बडे सरदार या राजा के निधन पर छोटी स्थिति वाले नायक का नेतृत्व मान्य न होता था, इसलिये अङ्गरेज धीरे धीरे एक स्थान के बाद दूसरे स्थान को और एक भूखण्ड के उपरान्त दूसरे भूखण्ड को अधिकृत करते चले जा रहे थे। अङ्गरेजो की क्रूरताओ ने भी विप्लव को नही दबा पाया था और न गोरखो और सिखो की सहायता से वे इस देश को पुन प्राप्त कर सकते थे। विप्लवकारियो मे सामन्त नेता के देहान्त के पश्चात् ही अनुशासन की कमी उत्पन्न हो जाती थी और इसी कारण उनको हार पर हार खानी पडी। नही तो तात्या टोपे इत्यादि सेनापतियो के होते हुये बडे बडे अङ्गरेज जनरल भी मात खा जाते। यही कारण दक्षिण में काम कर रहा था। जनरल रोज़ ने अपनी सेना के दो भाग किये। एक को उसने मऊ छावनी की ओर भेजा और दूसरे को लेकर वह सागर की ओर वढा। राहतगढ सागर से चौबीस मील के फासले पर था। यहा से पठान जनरल रोज़ का मुकाबिला कर