भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३८६ बोला, 'मुन्दरबाई लड्डू खाऊँगा और उन्ही हाथो से । मुन्दर—'कालोच भरे हाथो से ?' रघुनाथसिंह—'नही तो । गङ्गाजल से घुले हुये हाथो से । खा-पीकर आना ।' मुन्दर—'नही । यही खाऊँगी । नही तो आपको देर हो जायगी । इतने में बुर्ज की मुडेर पर एक गोला आ टकराया । मुन्दर ने कहा, 'यदि यह गोला मुझे लग जाता तो मैं नही बचती । आप मेरेशव को जला देते न ?' रघुनाथसिंह ज़रा तीव्र स्वर में बोला, 'और मुझको लग जाता तो आप मुझको दो लकड़ी दे देती या नही ?' मुन्दर की आंखो में आसू आ गये । कापते हुये गले से बोली, 'मैं पहले मरूँगी । आप आज गांठ बाघ लीजिये । यदि फिर वह बात कही तो लड्डू-वड्डू कुछ नही खिलाऊँगी ।' उन आसुओ के दर्पण में रघुनाथसिंह ने अपने प्राणोकी झांकी देखी । रघुनाथसिंह ने गद्गद् होकर कहा, 'मैं ऐसा कभी नही कहूंगा मुन्दरबाई, और न आप कभी ऐसा बोल मुँह से न निकालना ।' मुन्दर आसू पोछ कर धीरे धीरे चली गई । रघुनाथसिंह को सारा वातावरण नवप्रस्फुटित कलियो से भरा दिखलाई पडा । तोप एक खिलवाड, बारूद और गोले प्यार के खिलौने जान पडे । उसने प्रण किया, 'मुन्दर अखड रूप से मेरे हृदय का सम्पूर्ण सम्मान प्राप्त करेगी—कभी समय आवेगा ।' मुन्दर पानी का घडा और लड्डू, लेकर शीघ्र लौट आई । रघुनाथसिंह ने रोषपूर्ण स्वर में कहा, 'मै इस बुर्ज का प्रधान हूँ मुन्दरबाई । जानती हो ?'