भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३८८ झाँसी की रानी [ ७२ ] उस दिन तोपो पर रघुनाथसिंह और मुन्दर ने मिलकर काम किया बारूद और धुएँ ने दोनो के चेहरे और हाथ काले कर दिये । नित्य ही ऐसा हो जाता था । उस दिन कालोच कुछ और अधिक चढ गई थी । दोनो एक दूसरे को देख देख कर मुस्करा जाते थे । दोपहर के समय रघुनाथसिंह ने कहा, 'आज अभी तक खाना नही आया । मुन्दरबाई, आपको क्या भूख नही लगी है ?' 'मै लाती हू,' मुन्दर ने कहा । 'एक घडा जल भी,' रघुनाथसिंह ने प्रस्ताव किया, 'क्योकि यहा के घड़े का जल पीने लायक नही रहा ।' मुन्दर थकी हुई थी । हवा के झोको से उसके काले वाले की एक लट कालोच भरे चेहरे पर फहरा गई । थकावट और गहरी लक्षित हुई । रघुनाथसिंह ने कहा, 'नही आप पानी मत लाना । किसी से लिवा लाना । कोई न मिले तो खाना खाकर मै नीचे उतरकर पी आऊँगा, तबतक आप तोप सँभाले रहना । खा-पीकर आना । कोई जल्दी नही है ।' थकी हुई मुन्दर हँसी । जैसे अँधेरी रात में कोई तारा छिटक कर विलीन हो गया हो । बोली, 'मै क्या पानी का घडा न ला सकूँगी ?' रघुनाथसिंह— थक गई हैं आप ?' मुन्दर—'और आप ?' रघुनाथसिंह—'मै तो यही बैठा सुस्ता रहा हूं ।' मुन्दर—'यह मेरे प्रश्न का उत्तर है ?' रघुनाथसिंह—'अच्छा मैं नही थका हू मुन्दरबाई ।' मुन्दर—'तो मै भी दीवान साहव दो घडे उठा ला सकती हू ।' रघुनाथसिंह—'ऐसा मत करना ।' मुन्दर—'खाना क्या लाऊँ ? लड्डू लाऊँ ?' रघुनाथसिंह को उस रात के लड्डुओ की याद आ गई ।