भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३८७

में थी अच्छी नही चली और एक गोला महल के सामने जहा बारूद बन रही थी गिरा, फटा और बारूद जल कर घडाके के साथ २५-३० स्त्री पुरुषो को अपने साथ हवा में उठा ले गई—उनके अङ्गो का भी पता न चला कि कहां गये । बारूद में आग लग जाने के कारण किले में खलबली मच गई । भीषण नरसंहार तथा नगर के मकानो के भयानक विध्वन्स के कारण लोगो में निराशा फैलने लगी । किले की दीवारो में जगह जगह छेद हो गये थे । सन्ध्या के उपरान्त रानी शहर में गई । दीवारो का निरीक्षण किया । मरम्मत कराई । उस समय जब कि अन्य रातो की अपेक्षा इस रात अधिक गोलाबारी हो रही थी और, इतनी शीघ्रता के साथ मानो कोई कल काम कर रही हो; रात को देर में लौटी । सीधी महादेव के मन्दिर में गई । ध्यान के उपरान्त बारादरी मे थोड़ी देर के लिये जा लेटी । एक झपकी आई । उन्होने स्वप्न देखा:— एक गौरवर्णा युवती, सुन्दर आकृति वाली । बडे बडे काले नेत्र लाल रंग की साडी का अञ्चल बाधे हुये । आभूषणो से लदी हुई । वह स्त्री किले की बुर्ज पर खडी हुई अङ्गरेजो के लाल लाल गोलो को अपने कोमल करो में झेल रही है । कह रही है—'लक्ष्मीबाई देख, इन गोलो को झेलते झेलते मेरे हाथ काले हो गये हैं । चिन्ता मत कर । स्वराज्य की देवी अमर है ।' रानी की आंख खुली । भयंकर गोलाबारी हो रही थी और होती रही । पर उन्हे न कोई चिन्ता न थकान । झटपट जीने से उतरी और स्वप्न का सवाद सेनापति और मुख्य मुख्य दलपतियो को सुनाया । सवेरा होते होते यह संवाद सर्वत्र किले और नगर में फैल गया । तमाम स्त्री पुरुषो की नसो मे बिजली सी कोध गई । डटकर युद्ध होने लगा । पहले दिन की अपेक्षा भी अधिक घोर । उस दिन पीरअली और बरहामुद्दीन वाले मामले की जाच-पडताल न हो सकी परन्तु सन्ध्या समय रानी को मालूम हो गया कि दूल्हाजू ने अनमने होकर काम किया ।