भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३८३ झाँसी की रानी रानी ने रुखाई के साथ कहा, 'तुम मूर्ख मालूम होते हो । अपना काम न करके दूसरो के पीछे पीछे घूमते हो । अपना ठिया देखो ।' रानी आगे बढ गईं । साथ में जवाहरसिंह । जवाहरसिंह ने विनय की, 'सरकार पठान मूर्ख नही है । पीरअली की जांच होनी चाहिये ।' रानी ने उत्तर दिया, 'सामने का काम पहले निपटाओ और फिर जांच करो । पता लगाना यह कौन दीवान साहब हैं, जो पीरअली के साथ गया था ।' नये सैनिको का प्रबन्ध करके रानी किले को लौट आई । जवाहरसिंह शहर के इन्तज़ाम में उलझ गया । रानी ने ज़रा सा अवकाश मिलने पर मोतीबाई से बरहामुद्दीन वाली बात कही । मोतीबाई बोली, 'पीरअली बेईमानी कर सकता है । साथ में दीवान दूल्हाजू गये होगे । आप उनसे रुष्ट हुई थी ।' रानी ने कहा, 'जब तक जांच नही हुई है इन दोनो पर नज़र रखनी चाहिये, परन्तु सहसा ऐसा कोई काम न करना जिसके लिये पीछे पछताना पडे । पीरअली ने पहले अच्छे कार्य किये हैं और दीवान दूल्हाजू ने ओर्छा फाटक की-अच्छी संभाल की है । इस समय हाथ में कोई बढ़िया गोलन्दाज़ दूल्हाजू की जगह भेजने के लिए नही है ।' 'मेरे मन में आता है, मोतीबाई बोली, 'सुन्दर को दीवान साहब के साथ-दिन के काम के लिये कर दीजिये । रात के काम के लिये किसी और को भेज दिया जायगा ।' रानी ने स्वीकार किया । सुन्दर रात को जागी थी । सोने के लिये तैयार हुई थी कि उसको यह योजना बतलाई गई । सुन्दर की नीद भाग गई । वह नहा धोकर और थोड़ा सा खा पीकर ओर्छा फाटक पर पहुँच गई । उस दिन भी घनघोर युद्ध हुआ । दोनो तरफ विकट नरसंहार । केवल दो बाते विशेष हुईं, ओर्छा फाटक की वह तोप जो दूल्हाजू के हाथ