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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 526 में से

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पृष्ठ 396

लक्ष्मीबाई ३८५ रानी—'लाल पीले झंडे के विषय में जो कुछ कहना हो जल्दी कहो।' पीरअली—'अङ्गरेज़ धोखा देने के लिये खूनी झंडा किसी टेकड़ी पर उठाएंगे और वहां से गोलाबारी भी धूमधाम के साथ करेंगे, परन्तु हमला करेंगे किसी दूसरी दिशा से।' रानी—समझ लिया। कुछ और?' पीरअली—'बस हुज़ूर। केवल यह कि बरहामुद्दीन को मेरी बुर्ज पर से हटा दिया जाय।' रानी अनसुनी कर के जवाहरसिंह के साथ शहर की ओर गई। पीरअली दूसरी ओर चला गया। रानी को मार्ग में बरहामुद्दीन मिल गया। उसने रोक लिया। अनुनय के साथ प्रार्थना की, 'पीरअली से होशियार हो जायें सरकार। वह रात को अङ्गरेज़ी छावनी में जाते हैं।' रानी रात की जागी थी। सैनिको का तुरन्त प्रबन्ध करना अत्यन्त आवश्यक था। मार्ग की टोकाटाकी सहन नही हो रही थी। बोली, तुमको कैसे मालूम?' बरहामुद्दीन ने उत्तर दिया, 'में पीछे पीछे गया था। अङ्गरेज़ सन्त्री ने इनको टोका। इन्होंने इशारे की बोली में जवाब दिया। सन्त्री ने तुरन्त छावनी में जाने दिया। यह पहले दिन की बात है सरकार। गई रात वे किसी एक दीवान साहब को साथ ले गये थे। मै फिर पीछे पीछे गया। सन्त्री ने उसी तरह चिल्ला कर टोका। इन्होंने उसी तरह चिल्लाकर इशारे की बोली में जवाब दिया। दोनो को खट से छावनी में जाने की इजाजत मिल गई। ये लोग देर से लौटकर आये। जब दोनो अलग हुये पीरअली ने दूसरे से कहा, दीवान साहब लाल झंडे वाली बात याद रखना। मैने इन दीवान साहब को नही पहचान पाया। हुज़ूर, इस कार्ररबाई में दगा है। द्रोह है। खतरा है।' घोड़ा आगे बढने के लिए लगाम चबा रहा था, पैर पटक रहा था।

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