झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८४ झांसी की रानी बरहाम—'मान लिया मीरसाहब, मान लिया। लेकिन इतना तो बतला दीजिये कि आज किस तरह पहुँचे और क्या क्या कर आये?' पीरअली—'आप पीछे पीछे क्यो न चले आये?' बरहाम—'गया था, लेकिन लाल झण्डे की बात समझ में नही आई।' पीरअली सन्नाटे में आ गया, परन्तु उसको मनोनिग्रह का काफी अभ्यास था। बोला, 'लाल झण्डे वाली बात रानी साहब को बतलाई जावेगी, आपको नही।' बरहाम ने कहा, 'रानी साहब से मे भी कुछ अर्ज करूँगा। पीरअली अपने शयनागार में चला गया। उसको नीद नही आई। दो दिन पहले उसने एक निश्चय किया था। सबेरा होते ही वह रानी के पास पहुँचा। पिछले रोज बहुत तोपची और सैनिक मारे गये थे। रानी ने रात में तोपचियो का प्रबन्ध कर लिया था। तडके के पूर्व ही वह नये सैनिको की भर्ती के उपायो में व्यस्त थी। जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह भी उसी चिन्तन में वही थे। पीरअली ने तुरन्त निवेदन किया, 'श्रीमन्त सरकार, आज पश्चिमी मोर्चे से बहुत जोर का हमला होगा। जब आपका ध्यान उस ओर फटक जायगा तब दक्षिणी मोर्चे से जो जीवनशाह की टौरिया के बगल में है, धावा बोला जायगा। रात की जासूसी का यही समाचार है।' रानी ने उपेक्षा के साथ कहा, 'देखूँगी। प्रबन्ध हो गया है।' वह किसी काम के लिये शहर में जाने को उद्यत थी। पीरअली हाथ जोड कर बोला, 'श्रीमन्त सरकार उस बरहामुद्दीन को मेरे ठिये से हटा दिया जाय। वह मेरे काम में बहुत दखल देता है। 'देखूँगी,' रानी ने कहा, 'कुछ और कहना है?' 'हुजूर,' पीरअली ने जरा थर्राये हुये स्वर में कहा, 'एक लाल झण्डे के बारे में निवेदन करना है।'