झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई, ३८३
रोज़—'नही जी। वे सिर पर नही बैठना चाहते। वे तो अपनी मखमली गद्दियो पर बैठे रहना चाहते हैं। वही अडिग बने रहेगे।, पीरअली और 'दूल्हाजू मुहरी पर आ गये। दूल्हाजू ने फिर नाक दवाई। पीरअली ने मुहरी के सिरे पर पहुच कर कहा, 'दीवान साहव, लाल झन्डे वाली बात याद रखना।' दूल्हाजू धीरे से 'हूं' करके ओर्छा फाटक की ओर चला गया। उसके चले जाने पर पीरअली ने दीवार से सटा हुआ किसी को देखा। काप गया। बोला, 'कौन ?' बरहाम ने आगे बढकर उत्तर दिया, 'मैं हूं मीरसाहब।' हृदय की धडकन को दबाते हुये पीरअली ने कहा, 'म्यां खा साहब, यहाँ क्या कर रहे थे। 'मुहरी में छप छप की आवाज सुनकर शक हुआ, इसलिये यहा आ गया। आपके साथ दूसरा आदमी कौन था ?' 'होगा। आपको क्या मतलब ? पीरअली ने होश सँभालते हुये कहा, 'जासूसी मुकदमो की बातो में दखल नही देना चाहिये।' बरहाम—'आप तो कहते थे कि अकेले ही जायँगे। दो आदमी होने से खतरा बढ जायगा।' पीरअली—'आपको साथ ले जाता तो खतरा जरूर बढ जाता।' बरहाम—'यह दीवान साहव कौन आदमी था ?' पीरअली—'दीवान साहबो और खा साहबो की झाँसी में कोई कमी है ?' बरहाम—'हा, मीरसाहब अलबत्ता बहुत थोडे हैं।' पीरअली—'अपना काम देखिये। मैं तो जाकर सोता हूँ। इतना ख्याल रखिये कि किसी के राज़ में अपना पैर नही पटकना चाहिये।'