भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३८२ झाँसी की रानी दूल्हाजू ने तदनुसार कसम खाई । पीरअली ने विनय की, 'हुजूर को इनाम भी इसी समय बतला देना चाहिये ।' रोज ने तुरन्त वरदान दिया, 'दो गांव जागीर में दीवान साहब, हमेशा के लिये ।' दूल्हाजू ने क्षीण मुस्कराहट के साथ स्वीकार किया । दूल्हाजू ने प्रश्न किया, 'कब ?' रोज ने उत्तर दियो, 'जब हम झांसी पर अधिकार करके शान्ति स्थापित कर लेंगे ।' 'यह नही पूछा,' दूल्हाजू ने कहा, 'वह काम कब करना होगा ?' रोज और स्टुअर्ट ने सलाह की । रोज बोला, 'जब हमारे मोर्चे के पीछे लाल झण्डा देखो। लेकिन जब तक, लाल झण्डा न देखो तब तक गोले टेकड़ी के नीचे हिस्से में लगें, हमारे तोपखाने या दस्ते पर गोला न आवे और हमारे तोपखाने का गोला तुम्हारे ऊपर न गिरेगा । या तो दीवार की जड़ में पड़ेगा या तुम्हारे बगल में जो ऊँचाई पर बुर्ज है उसपर पडेगा । यदि तुमने हमारे साथ बेईमानी की तो सबसे पहले तुमको फाँसी दी जायगी ।' दूल्हाजू का चेहरा तमतमा गया । 'मैने बहुत बड़ी कसम खाई है। इन मीरसाहब को मालूम है कि रानी साहब से मेरा दिल बिलकुल फिर गया है।' पीरअली ने समर्थन किया । इसके उपरान्त वे दोनो चले गये । रोज ने स्टुअर्ट से कहा, 'राज-खानदान के लोगो को हाथ में रखना जरूरी है। डलहौजी ने इन लोगो को अपमानित करके हिन्दुस्थान को बिलकुल ही खो दिया होता ।' स्टुअर्ट — 'लेकिन आगे चलकर इन लोगो को सिर पर भी नही बिठलाना है ।'