भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ३८१ रोज—'तुम्हारे साथ दूसरा आदमी कौन है ?' पीरअली—'दीवान दूल्हाजू ठाकुर साहब । ओर्छा-फाटक का तोपखाना इन्ही के हाथ में है ।' रोज—'मैं खुश हुआ । यह किसी राजपरिवार का पुरुष है ?' पीरअली—'जी हाँ ।' रोज—'आप क्या काम करोगे दीवान साहब ?' दूल्हाजू—'जो कहा जाय ।' पीरअली—'यह सच्चे आदमी हैं । साहब । गङ्गाजली की सौगन्ध लेंगे । रोज समझ गया । दूल्हाजू के पसीना छूट गया । निकल भागने को जी चाहा, परन्तु वहा बाल बराबर भी सास न थी । रोज ने एक हिन्दू सिपाही से लोटा भरकर मँगवाया । रोज ने कहा 'आपको गङ्गा जी की सौगन्ध खानी पडेगी ।' दूल्हाजू ने लोटा दोनो हाथो में ले लिया । आंखे बन्द कर ली । रानी का कुपित चेहरा सामने फिर गया । उसने आंखे खोल ली । रोज़ ने सोचा शपथ गम्भीरता पूर्वक ले रहा है । पीरअली ने अनुरोध किया, 'सौगन्ध ले लीजिये दीवान साहब ।' दूल्हाजू ने शपथ ली, 'गङ्गाजी मुझको मारे, जो मैं बेईमानी करूं ।' 'रोज—'बेईमानी किसके साथ ? शपथ लो कि कम्पनी सरकार के साथ, अंग्रेजो के साथ बेइमानी नही करूँगा ।' पीरअली—'ले लीजिये सौगन्ध दीवान साहब ।' दूल्हाजू ने शपथ ली, 'कम्पनी सरकार के साथ, अंग्रेज़ो के साथ बेईमानी नही करूँगा ।' और उसने लोटा नीचे रख दिया । रोज ने कहा, 'अभी नही । लोटा फिर हाथ में लीजिये और यह कहिये कि ओर्छा फाटक का तोपखाना या तो बेकार कर देंगे या तोपखाने से गोला नही छोड़ेगे और ओर्छा फाटक हमारे हवाले कर देंगे ।'