झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८० झाँसी की रानी [ ७१ ] बरहामुद्दीन सागर खिडकी की तोप पर पीरअली की जगह आ गया । पीरअली ने उससे कहा, 'आज बहुत से पते लगाने के लिये अङ्गरेज़ी छावनी में जाना है ।' 'शौक से जाइये,' बरहाम बोला, 'अकेले ही जाइयेगा ? बड़ा खतरनाक काम है ।' पीरअली ने उत्तर दिया, 'अकेला ही जाऊँगा । दो आदमी होने से खतरा बढ जायगा ।' पीरअली खिडकी पर से उतरा । थोडी देर ही ठहरा था कि दूल्हाजू आ गया । ओर्छा फाटक पर उसकी जगह सुन्दर आ गई थी । दूल्हाजू को बरहामुद्दीन ने नही देख पाया । पीरअली और दूल्हाजू मुहरी में धसे । धसते ही दूल्हाजू ने नाक दबाई । धीरे से कहा, 'मीरसाहब यह तो बहुत सकरी और गन्दी रास्ता है ।' पीरअली धीरे से बोला, 'दीवान साहब वहाँ पहुँचने का यही एक- मात्र मार्ग है ।' उन दोनो के निकल जाने पर धीरे से बरहामुद्दीन मुहरी में उतरा और आड ओट लेते हुये, पहले सन्त्री के छबीने तक चला गया । संत्री ने टोका । पीरअली ने बँधे हुये सकेत की भाषा में जवाब दिया । वे दोनो छावनी मे चले गये । बरहामुद्दीन ने सोचा, 'पीरअली, अवश्य कोई घातक षडयन्त्र रच रहा है । और वह झासी के लिये शुभ नही जान पड़ता । आज दूसरा आदमी इसके साथ कौन है ?' बरहामुद्दीन सावधानी के साथ लौट आया । हाथ पैर धोकर मुहरी की बगल में बैठ गया और पीरअली की बाट जोहने लगा । दूल्हाजू के साथ पीरअली रोज के सामने पेश हुआ । स्टुअर्ट पास था । पूछताछ शुरू हुई ।