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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

३८० झाँसी की रानी [ ७१ ] बरहामुद्दीन सागर खिडकी की तोप पर पीरअली की जगह आ गया । पीरअली ने उससे कहा, 'आज बहुत से पते लगाने के लिये अङ्गरेज़ी छावनी में जाना है ।' 'शौक से जाइये,' बरहाम बोला, 'अकेले ही जाइयेगा ? बड़ा खतरनाक काम है ।' पीरअली ने उत्तर दिया, 'अकेला ही जाऊँगा । दो आदमी होने से खतरा बढ जायगा ।' पीरअली खिडकी पर से उतरा । थोडी देर ही ठहरा था कि दूल्हाजू आ गया । ओर्छा फाटक पर उसकी जगह सुन्दर आ गई थी । दूल्हाजू को बरहामुद्दीन ने नही देख पाया । पीरअली और दूल्हाजू मुहरी में धसे । धसते ही दूल्हाजू ने नाक दबाई । धीरे से कहा, 'मीरसाहब यह तो बहुत सकरी और गन्दी रास्ता है ।' पीरअली धीरे से बोला, 'दीवान साहब वहाँ पहुँचने का यही एक- मात्र मार्ग है ।' उन दोनो के निकल जाने पर धीरे से बरहामुद्दीन मुहरी में उतरा और आड ओट लेते हुये, पहले सन्त्री के छबीने तक चला गया । संत्री ने टोका । पीरअली ने बँधे हुये सकेत की भाषा में जवाब दिया । वे दोनो छावनी मे चले गये । बरहामुद्दीन ने सोचा, 'पीरअली, अवश्य कोई घातक षडयन्त्र रच रहा है । और वह झासी के लिये शुभ नही जान पड़ता । आज दूसरा आदमी इसके साथ कौन है ?' बरहामुद्दीन सावधानी के साथ लौट आया । हाथ पैर धोकर मुहरी की बगल में बैठ गया और पीरअली की बाट जोहने लगा । दूल्हाजू के साथ पीरअली रोज के सामने पेश हुआ । स्टुअर्ट पास था । पूछताछ शुरू हुई ।

लक्ष्मीबाई ३८१ रोज—'तुम्हारे साथ दूसरा आदमी कौन है ?' पीरअली—'दीवान दूल्हाजू ठाकुर साहब । ओर्छा-फाटक का तोपखाना इन्ही के हाथ में है ।' रोज—'मैं खुश हुआ । यह किसी राजपरिवार का पुरुष है ?' पीरअली—'जी हाँ ।' रोज—'आप क्या काम करोगे दीवान साहब ?' दूल्हाजू—'जो कहा जाय ।' पीरअली—'यह सच्चे आदमी हैं । साहब । गङ्गाजली की सौगन्ध लेंगे । रोज समझ गया । दूल्हाजू के पसीना छूट गया । निकल भागने को जी चाहा, परन्तु वहा बाल बराबर भी सास न थी । रोज ने एक हिन्दू सिपाही से लोटा भरकर मँगवाया । रोज ने कहा 'आपको गङ्गा जी की सौगन्ध खानी पडेगी ।' दूल्हाजू ने लोटा दोनो हाथो में ले लिया । आंखे बन्द कर ली । रानी का कुपित चेहरा सामने फिर गया । उसने आंखे खोल ली । रोज़ ने सोचा शपथ गम्भीरता पूर्वक ले रहा है । पीरअली ने अनुरोध किया, 'सौगन्ध ले लीजिये दीवान साहब ।' दूल्हाजू ने शपथ ली, 'गङ्गाजी मुझको मारे, जो मैं बेईमानी करूं ।' 'रोज—'बेईमानी किसके साथ ? शपथ लो कि कम्पनी सरकार के साथ, अंग्रेजो के साथ बेइमानी नही करूँगा ।' पीरअली—'ले लीजिये सौगन्ध दीवान साहब ।' दूल्हाजू ने शपथ ली, 'कम्पनी सरकार के साथ, अंग्रेज़ो के साथ बेईमानी नही करूँगा ।' और उसने लोटा नीचे रख दिया । रोज ने कहा, 'अभी नही । लोटा फिर हाथ में लीजिये और यह कहिये कि ओर्छा फाटक का तोपखाना या तो बेकार कर देंगे या तोपखाने से गोला नही छोड़ेगे और ओर्छा फाटक हमारे हवाले कर देंगे ।'

३८२ झाँसी की रानी दूल्हाजू ने तदनुसार कसम खाई । पीरअली ने विनय की, 'हुजूर को इनाम भी इसी समय बतला देना चाहिये ।' रोज ने तुरन्त वरदान दिया, 'दो गांव जागीर में दीवान साहब, हमेशा के लिये ।' दूल्हाजू ने क्षीण मुस्कराहट के साथ स्वीकार किया । दूल्हाजू ने प्रश्न किया, 'कब ?' रोज ने उत्तर दियो, 'जब हम झांसी पर अधिकार करके शान्ति स्थापित कर लेंगे ।' 'यह नही पूछा,' दूल्हाजू ने कहा, 'वह काम कब करना होगा ?' रोज और स्टुअर्ट ने सलाह की । रोज बोला, 'जब हमारे मोर्चे के पीछे लाल झण्डा देखो। लेकिन जब तक, लाल झण्डा न देखो तब तक गोले टेकड़ी के नीचे हिस्से में लगें, हमारे तोपखाने या दस्ते पर गोला न आवे और हमारे तोपखाने का गोला तुम्हारे ऊपर न गिरेगा । या तो दीवार की जड़ में पड़ेगा या तुम्हारे बगल में जो ऊँचाई पर बुर्ज है उसपर पडेगा । यदि तुमने हमारे साथ बेईमानी की तो सबसे पहले तुमको फाँसी दी जायगी ।' दूल्हाजू का चेहरा तमतमा गया । 'मैने बहुत बड़ी कसम खाई है। इन मीरसाहब को मालूम है कि रानी साहब से मेरा दिल बिलकुल फिर गया है।' पीरअली ने समर्थन किया । इसके उपरान्त वे दोनो चले गये । रोज ने स्टुअर्ट से कहा, 'राज-खानदान के लोगो को हाथ में रखना जरूरी है। डलहौजी ने इन लोगो को अपमानित करके हिन्दुस्थान को बिलकुल ही खो दिया होता ।' स्टुअर्ट — 'लेकिन आगे चलकर इन लोगो को सिर पर भी नही बिठलाना है ।'

लक्ष्मीबाई, ३८३

रोज़—'नही जी। वे सिर पर नही बैठना चाहते। वे तो अपनी मखमली गद्दियो पर बैठे रहना चाहते हैं। वही अडिग बने रहेगे।, पीरअली और 'दूल्हाजू मुहरी पर आ गये। दूल्हाजू ने फिर नाक दवाई। पीरअली ने मुहरी के सिरे पर पहुच कर कहा, 'दीवान साहव, लाल झन्डे वाली बात याद रखना।' दूल्हाजू धीरे से 'हूं' करके ओर्छा फाटक की ओर चला गया। उसके चले जाने पर पीरअली ने दीवार से सटा हुआ किसी को देखा। काप गया। बोला, 'कौन ?' बरहाम ने आगे बढकर उत्तर दिया, 'मैं हूं मीरसाहब।' हृदय की धडकन को दबाते हुये पीरअली ने कहा, 'म्यां खा साहब, यहाँ क्या कर रहे थे। 'मुहरी में छप छप की आवाज सुनकर शक हुआ, इसलिये यहा आ गया। आपके साथ दूसरा आदमी कौन था ?' 'होगा। आपको क्या मतलब ? पीरअली ने होश सँभालते हुये कहा, 'जासूसी मुकदमो की बातो में दखल नही देना चाहिये।' बरहाम—'आप तो कहते थे कि अकेले ही जायँगे। दो आदमी होने से खतरा बढ जायगा।' पीरअली—'आपको साथ ले जाता तो खतरा जरूर बढ जाता।' बरहाम—'यह दीवान साहव कौन आदमी था ?' पीरअली—'दीवान साहबो और खा साहबो की झाँसी में कोई कमी है ?' बरहाम—'हा, मीरसाहब अलबत्ता बहुत थोडे हैं।' पीरअली—'अपना काम देखिये। मैं तो जाकर सोता हूँ। इतना ख्याल रखिये कि किसी के राज़ में अपना पैर नही पटकना चाहिये।'

३८४ झांसी की रानी बरहाम—'मान लिया मीरसाहब, मान लिया। लेकिन इतना तो बतला दीजिये कि आज किस तरह पहुँचे और क्या क्या कर आये?' पीरअली—'आप पीछे पीछे क्यो न चले आये?' बरहाम—'गया था, लेकिन लाल झण्डे की बात समझ में नही आई।' पीरअली सन्नाटे में आ गया, परन्तु उसको मनोनिग्रह का काफी अभ्यास था। बोला, 'लाल झण्डे वाली बात रानी साहब को बतलाई जावेगी, आपको नही।' बरहाम ने कहा, 'रानी साहब से मे भी कुछ अर्ज करूँगा। पीरअली अपने शयनागार में चला गया। उसको नीद नही आई। दो दिन पहले उसने एक निश्चय किया था। सबेरा होते ही वह रानी के पास पहुँचा। पिछले रोज बहुत तोपची और सैनिक मारे गये थे। रानी ने रात में तोपचियो का प्रबन्ध कर लिया था। तडके के पूर्व ही वह नये सैनिको की भर्ती के उपायो में व्यस्त थी। जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह भी उसी चिन्तन में वही थे। पीरअली ने तुरन्त निवेदन किया, 'श्रीमन्त सरकार, आज पश्चिमी मोर्चे से बहुत जोर का हमला होगा। जब आपका ध्यान उस ओर फटक जायगा तब दक्षिणी मोर्चे से जो जीवनशाह की टौरिया के बगल में है, धावा बोला जायगा। रात की जासूसी का यही समाचार है।' रानी ने उपेक्षा के साथ कहा, 'देखूँगी। प्रबन्ध हो गया है।' वह किसी काम के लिये शहर में जाने को उद्यत थी। पीरअली हाथ जोड कर बोला, 'श्रीमन्त सरकार उस बरहामुद्दीन को मेरे ठिये से हटा दिया जाय। वह मेरे काम में बहुत दखल देता है। 'देखूँगी,' रानी ने कहा, 'कुछ और कहना है?' 'हुजूर,' पीरअली ने जरा थर्राये हुये स्वर में कहा, 'एक लाल झण्डे के बारे में निवेदन करना है।'

लक्ष्मीबाई ३८५ रानी—'लाल पीले झंडे के विषय में जो कुछ कहना हो जल्दी कहो।' पीरअली—'अङ्गरेज़ धोखा देने के लिये खूनी झंडा किसी टेकड़ी पर उठाएंगे और वहां से गोलाबारी भी धूमधाम के साथ करेंगे, परन्तु हमला करेंगे किसी दूसरी दिशा से।' रानी—समझ लिया। कुछ और?' पीरअली—'बस हुज़ूर। केवल यह कि बरहामुद्दीन को मेरी बुर्ज पर से हटा दिया जाय।' रानी अनसुनी कर के जवाहरसिंह के साथ शहर की ओर गई। पीरअली दूसरी ओर चला गया। रानी को मार्ग में बरहामुद्दीन मिल गया। उसने रोक लिया। अनुनय के साथ प्रार्थना की, 'पीरअली से होशियार हो जायें सरकार। वह रात को अङ्गरेज़ी छावनी में जाते हैं।' रानी रात की जागी थी। सैनिको का तुरन्त प्रबन्ध करना अत्यन्त आवश्यक था। मार्ग की टोकाटाकी सहन नही हो रही थी। बोली, तुमको कैसे मालूम?' बरहामुद्दीन ने उत्तर दिया, 'में पीछे पीछे गया था। अङ्गरेज़ सन्त्री ने इनको टोका। इन्होंने इशारे की बोली में जवाब दिया। सन्त्री ने तुरन्त छावनी में जाने दिया। यह पहले दिन की बात है सरकार। गई रात वे किसी एक दीवान साहब को साथ ले गये थे। मै फिर पीछे पीछे गया। सन्त्री ने उसी तरह चिल्ला कर टोका। इन्होंने उसी तरह चिल्लाकर इशारे की बोली में जवाब दिया। दोनो को खट से छावनी में जाने की इजाजत मिल गई। ये लोग देर से लौटकर आये। जब दोनो अलग हुये पीरअली ने दूसरे से कहा, दीवान साहब लाल झंडे वाली बात याद रखना। मैने इन दीवान साहब को नही पहचान पाया। हुज़ूर, इस कार्ररबाई में दगा है। द्रोह है। खतरा है।' घोड़ा आगे बढने के लिए लगाम चबा रहा था, पैर पटक रहा था।

३८३ झाँसी की रानी रानी ने रुखाई के साथ कहा, 'तुम मूर्ख मालूम होते हो । अपना काम न करके दूसरो के पीछे पीछे घूमते हो । अपना ठिया देखो ।' रानी आगे बढ गईं । साथ में जवाहरसिंह । जवाहरसिंह ने विनय की, 'सरकार पठान मूर्ख नही है । पीरअली की जांच होनी चाहिये ।' रानी ने उत्तर दिया, 'सामने का काम पहले निपटाओ और फिर जांच करो । पता लगाना यह कौन दीवान साहब हैं, जो पीरअली के साथ गया था ।' नये सैनिको का प्रबन्ध करके रानी किले को लौट आई । जवाहरसिंह शहर के इन्तज़ाम में उलझ गया । रानी ने ज़रा सा अवकाश मिलने पर मोतीबाई से बरहामुद्दीन वाली बात कही । मोतीबाई बोली, 'पीरअली बेईमानी कर सकता है । साथ में दीवान दूल्हाजू गये होगे । आप उनसे रुष्ट हुई थी ।' रानी ने कहा, 'जब तक जांच नही हुई है इन दोनो पर नज़र रखनी चाहिये, परन्तु सहसा ऐसा कोई काम न करना जिसके लिये पीछे पछताना पडे । पीरअली ने पहले अच्छे कार्य किये हैं और दीवान दूल्हाजू ने ओर्छा फाटक की-अच्छी संभाल की है । इस समय हाथ में कोई बढ़िया गोलन्दाज़ दूल्हाजू की जगह भेजने के लिए नही है ।' 'मेरे मन में आता है, मोतीबाई बोली, 'सुन्दर को दीवान साहब के साथ-दिन के काम के लिये कर दीजिये । रात के काम के लिये किसी और को भेज दिया जायगा ।' रानी ने स्वीकार किया । सुन्दर रात को जागी थी । सोने के लिये तैयार हुई थी कि उसको यह योजना बतलाई गई । सुन्दर की नीद भाग गई । वह नहा धोकर और थोड़ा सा खा पीकर ओर्छा फाटक पर पहुँच गई । उस दिन भी घनघोर युद्ध हुआ । दोनो तरफ विकट नरसंहार । केवल दो बाते विशेष हुईं, ओर्छा फाटक की वह तोप जो दूल्हाजू के हाथ

लक्ष्मीबाई ३८७

में थी अच्छी नही चली और एक गोला महल के सामने जहा बारूद बन रही थी गिरा, फटा और बारूद जल कर घडाके के साथ २५-३० स्त्री पुरुषो को अपने साथ हवा में उठा ले गई—उनके अङ्गो का भी पता न चला कि कहां गये । बारूद में आग लग जाने के कारण किले में खलबली मच गई । भीषण नरसंहार तथा नगर के मकानो के भयानक विध्वन्स के कारण लोगो में निराशा फैलने लगी । किले की दीवारो में जगह जगह छेद हो गये थे । सन्ध्या के उपरान्त रानी शहर में गई । दीवारो का निरीक्षण किया । मरम्मत कराई । उस समय जब कि अन्य रातो की अपेक्षा इस रात अधिक गोलाबारी हो रही थी और, इतनी शीघ्रता के साथ मानो कोई कल काम कर रही हो; रात को देर में लौटी । सीधी महादेव के मन्दिर में गई । ध्यान के उपरान्त बारादरी मे थोड़ी देर के लिये जा लेटी । एक झपकी आई । उन्होने स्वप्न देखा:— एक गौरवर्णा युवती, सुन्दर आकृति वाली । बडे बडे काले नेत्र लाल रंग की साडी का अञ्चल बाधे हुये । आभूषणो से लदी हुई । वह स्त्री किले की बुर्ज पर खडी हुई अङ्गरेजो के लाल लाल गोलो को अपने कोमल करो में झेल रही है । कह रही है—'लक्ष्मीबाई देख, इन गोलो को झेलते झेलते मेरे हाथ काले हो गये हैं । चिन्ता मत कर । स्वराज्य की देवी अमर है ।' रानी की आंख खुली । भयंकर गोलाबारी हो रही थी और होती रही । पर उन्हे न कोई चिन्ता न थकान । झटपट जीने से उतरी और स्वप्न का सवाद सेनापति और मुख्य मुख्य दलपतियो को सुनाया । सवेरा होते होते यह संवाद सर्वत्र किले और नगर में फैल गया । तमाम स्त्री पुरुषो की नसो मे बिजली सी कोध गई । डटकर युद्ध होने लगा । पहले दिन की अपेक्षा भी अधिक घोर । उस दिन पीरअली और बरहामुद्दीन वाले मामले की जाच-पडताल न हो सकी परन्तु सन्ध्या समय रानी को मालूम हो गया कि दूल्हाजू ने अनमने होकर काम किया ।

३८८ झाँसी की रानी [ ७२ ] उस दिन तोपो पर रघुनाथसिंह और मुन्दर ने मिलकर काम किया बारूद और धुएँ ने दोनो के चेहरे और हाथ काले कर दिये । नित्य ही ऐसा हो जाता था । उस दिन कालोच कुछ और अधिक चढ गई थी । दोनो एक दूसरे को देख देख कर मुस्करा जाते थे । दोपहर के समय रघुनाथसिंह ने कहा, 'आज अभी तक खाना नही आया । मुन्दरबाई, आपको क्या भूख नही लगी है ?' 'मै लाती हू,' मुन्दर ने कहा । 'एक घडा जल भी,' रघुनाथसिंह ने प्रस्ताव किया, 'क्योकि यहा के घड़े का जल पीने लायक नही रहा ।' मुन्दर थकी हुई थी । हवा के झोको से उसके काले वाले की एक लट कालोच भरे चेहरे पर फहरा गई । थकावट और गहरी लक्षित हुई । रघुनाथसिंह ने कहा, 'नही आप पानी मत लाना । किसी से लिवा लाना । कोई न मिले तो खाना खाकर मै नीचे उतरकर पी आऊँगा, तबतक आप तोप सँभाले रहना । खा-पीकर आना । कोई जल्दी नही है ।' थकी हुई मुन्दर हँसी । जैसे अँधेरी रात में कोई तारा छिटक कर विलीन हो गया हो । बोली, 'मै क्या पानी का घडा न ला सकूँगी ?' रघुनाथसिंह— थक गई हैं आप ?' मुन्दर—'और आप ?' रघुनाथसिंह—'मै तो यही बैठा सुस्ता रहा हूं ।' मुन्दर—'यह मेरे प्रश्न का उत्तर है ?' रघुनाथसिंह—'अच्छा मैं नही थका हू मुन्दरबाई ।' मुन्दर—'तो मै भी दीवान साहव दो घडे उठा ला सकती हू ।' रघुनाथसिंह—'ऐसा मत करना ।' मुन्दर—'खाना क्या लाऊँ ? लड्डू लाऊँ ?' रघुनाथसिंह को उस रात के लड्डुओ की याद आ गई ।

लक्ष्मीबाई ३८६ बोला, 'मुन्दरबाई लड्डू खाऊँगा और उन्ही हाथो से । मुन्दर—'कालोच भरे हाथो से ?' रघुनाथसिंह—'नही तो । गङ्गाजल से घुले हुये हाथो से । खा-पीकर आना ।' मुन्दर—'नही । यही खाऊँगी । नही तो आपको देर हो जायगी । इतने में बुर्ज की मुडेर पर एक गोला आ टकराया । मुन्दर ने कहा, 'यदि यह गोला मुझे लग जाता तो मैं नही बचती । आप मेरेशव को जला देते न ?' रघुनाथसिंह ज़रा तीव्र स्वर में बोला, 'और मुझको लग जाता तो आप मुझको दो लकड़ी दे देती या नही ?' मुन्दर की आंखो में आसू आ गये । कापते हुये गले से बोली, 'मैं पहले मरूँगी । आप आज गांठ बाघ लीजिये । यदि फिर वह बात कही तो लड्डू-वड्डू कुछ नही खिलाऊँगी ।' उन आसुओ के दर्पण में रघुनाथसिंह ने अपने प्राणोकी झांकी देखी । रघुनाथसिंह ने गद्गद् होकर कहा, 'मैं ऐसा कभी नही कहूंगा मुन्दरबाई, और न आप कभी ऐसा बोल मुँह से न निकालना ।' मुन्दर आसू पोछ कर धीरे धीरे चली गई । रघुनाथसिंह को सारा वातावरण नवप्रस्फुटित कलियो से भरा दिखलाई पडा । तोप एक खिलवाड, बारूद और गोले प्यार के खिलौने जान पडे । उसने प्रण किया, 'मुन्दर अखड रूप से मेरे हृदय का सम्पूर्ण सम्मान प्राप्त करेगी—कभी समय आवेगा ।' मुन्दर पानी का घडा और लड्डू, लेकर शीघ्र लौट आई । रघुनाथसिंह ने रोषपूर्ण स्वर में कहा, 'मै इस बुर्ज का प्रधान हूँ मुन्दरबाई । जानती हो ?'

० ३६० झांसी की रानी मुन्दर कुछ आश्चर्य, कुछ कुतूहल और कुछ शरारत के साथ देखने लगी । रघुनाथसिंह के स्वर का रोष तुरन्त अवरोध में परिणत हुआ । बोला, 'मैने कहा था कि खा-पीकर आना। वैसे ही क्यो चली आई ? मेरी बात की अवज्ञा क्यो की ?' मुन्दर ने मुस्कराकर कहा, मैने भी तो जता दिया था कि यही आकर खाऊँगी।' रघुनाथसिंह के थके हुये चेहरे पर मुस्कराहट दौड गई। बोला, 'याद आ गया तो अब हाथ मुँह धोकर खाओ।' 'पहले आप', मुन्दर ने अनुरोध किया । रघुनाथसिंह ने हठ किया, 'पहले तुम ।' 'तुम' शब्द ने मुन्दर को पुलकित कर दिया बोली, 'मेरे हाथ से खाना हो तो आप प्रारम्भ करो।' 'नही तो ?' रघुनाथसिंह ने प्रश्न किया । 'नही तो क्यो, लड्डू अपने हाथ से खाने पड़ेगे।' मुन्दर ने उत्तर दिया । रघुनाथसिंह ने स्वीकार कर लिया। हाथ मुँह धोया। मुन्दर ने एक ओर बैठकर लड्डू खिलाये । रघुनाथसिंह ने प्रस्ताव किया, 'अब मै तुम को खिलाऊँगा।' मुन्दर बहुत हँसी । बोली, 'अरे वाह ऐसा कही होता है ! मैं अकेले में बैठकर खाऊँगी।' रघुनाथसिंह मान गया । उसने सब कुछ पा लिया । उसको मृत्यु का कोई भय नही रहा । और मुन्दर को ? लक्ष्मीबाई की सहेली को मृत्यु का डर !

लक्ष्मीबाई ३६१ [ ७३ ] तात्या टोपे चरखारी को जीतकर कालपी लौटा। उसकी सेना में ग्वालियर का वह यूथ भी था जिसने कानपुर में जनरल विढम को पराजित करने में हाथ बटाया था। सिपाही विजयोत्सव मना रहे थे और तात्या कालपी के विशाल शस्त्रागार का निरीक्षण कर रहा था। भांति भांति के गोले ढाले जा रहे थे। बन्दूकें बनाई और बाधी जा रही थी। दो हजार मन बारूद के होते हुये भी और बारूद तेजी के साथ तैयार की जा रही थी। अन्य प्रकार के शस्त्र और उनके अङ्गोपाङ्ग बनाये और खराद मशीनो पर संभाले जा रहे थे। बहुत सी मशीने नई विलायती थी। उसी समय दो सवार पहरे वालो के पास उतरे। दोनो सुन्दर युवक जुल्फो पर साफा बाधे हुये। पहरे वालो से कहा, 'सरदार साहब से इसी समय मिलना है।' झांसी की रानी साहब की चिट्ठी लाये हैं।' उन लोगो ने झांसी के युद्ध की गति के विषय में जिज्ञासा की। युवको ने संक्षेप में बतला दिया। शीघ्र ही दोनो तात्या के सामने पहुचा दिये गये। तात्या ने अकेले में ले जाकर कहा, 'एक साहब को तो पहिचानता हूँ दूसरे साहब—?' जूही ने उत्तर दिया, 'आप काशीबाई जी हैं।' तात्या ने अभिवादन किया। दोनो से झांसी के युद्ध का वृत्तान्त जितना उनके सामने हो चुका था और जो उन्होने मार्ग के बटोहियो से सुना था विस्तार पूर्वक सुना दिया। रानी की चिट्ठी भी पढी। तात्या बोला, 'आज ही झाँसी की ओर कूच करता हू। सेना को चरखारी से लौट कर काफी विश्राम मिल चुका है। आप लोग हमारे साथ चलिये। अब अकेले लौटना ठीक नही है।' काशीबाई ने कहा, 'फाटक बन्द हो चुके हैं। चारो ओर अंग्रेजो का कड़ा पहरा है।'

तात्या—'आप लोग हमारे साथ सुरक्षित रहेगे।' काशीबाई—'हम लोग भी लडना जानते हैं।' जूही—'जानती हैं।' और वह मुसकराई। तात्या ने हँसकर कहा, 'उसी भाषा में बोलिये। मैं सैनिको का भी सन्देह जाग्रत नही करना चाहता हू।' तात्या ने उसी दिन कूच कर दिया। साथ में बीस सहस्त्र सेना। बाकी सेना और कालपी का प्रबन्ध रावसाहब के हाथ में छोड दिया। तात्या को झासी तक पहुँचने में कुछ समय लगा। परन्तु उसके पहुँचने के पहले ही रोज को पता लग गया कि एक बडी सेना और भारी तोपें लिये हुये तात्या झासी की सहायता के लिये आ रहा है। रोज चिन्तित हुआ। उसने अपने यूथनायको और दलनायको की सम्मति से एक योजना बनाई। प्रत्येक मोर्चे के तोपखानो से एक एक तोप ली। केवल जरूरी सेना झासी के इर्द गिर्द छोडकर, बाकी के कई दस्ते बनाये। कुछ को झांसी कालपी का मार्ग रुद्ध करने के लिये झासी से सात मील दिगारा की दुतर्फा टौरियो पर भेज कर छिपा दिया। कुछ उत्तर की ओर दस मील पर गढमऊ की झील की पहाडियो पर। कुछ को कामासिन टौरिया और ओरछा के मार्ग के अगल बगल जमा दिया। तात्या ने अपनी सेना का [बडा भाग अपने पास बेतवा से झासी की ओर दो मील पर नदी के किनारे नोहट घाट और तिलैथा घाट के बीच में रक्खा और बडी बडी तोपें। बाकी सेना को तीन भागो में विभक्त करके गढमऊ की ओर दिगारा की टौरियो की बीच में होकर झासी की ओर भेजा। इन दस्तो के पास छोटी तोपे थी। साथ में काशी और जूही थी। पहली एप्रेल का प्रातः काल हुआ। झासी पर बन्दूकचियो के हमले तो बिलकुल नही हुये, परन्तु गोलाबारी भयानक हुई। गोलो के ठीक निशाने नही पड रहे थे। साफ था कि अङ्गरेजी तोपखाने अपना बरकाव कर रहे हैं और झासी वालो को केवल व्यस्त रखना उनका उद्देश्य है। परन्तु जवाहरसिंह ने इसका यह अर्थ लगाया कि अग्रेजो के

लक्ष्मीबाई ३६३ निपुण तोपची मारे गये हैं और अब कच्चे आदमी काम कर रहे हैं । रानी सहमत नही हुई । उन्होने कहा, 'अङ्गरेजो के सामने कोई नई दुविधा आ गई है । सेना और तोपखानो को बाट दिया गया है, और कोई बात नही ।' रानी ने बडी दूरबीन उठाई । झासी की ओर आने वाले तात्या के दस्तो को दूरी पर देखा । मुस्कराकर दूरबीन जवाहरसिंह के हाथ में दी । बोली, 'अब झासी का उद्धार निकट है ।' जवाहरसिंह दूरबीन से देखकर उछल पडा । झासी भर में समाचार फैल गया कि झासी की सहायता के लिये पेशवा की सेना आ गई । झासी से दिन भर गोलाबारी बहुत हल्की रही । लालता ने सम्मति दी, 'हमारे गोले कही पेशवा की सेना पर न पडे ।' और गोलन्दाजो का भी यही मत था । पूर्व और उत्तर के तोपखाने करीब करीब बन्द रहे । केवल पश्चिम और दक्षिण के तोपखाने कुछ काम करते रहे । झासी की दिन भर की आशा सन्ध्या समय निराशा में परिवर्तित होने को थी । टोरियो के बीचो बीच आते ही तात्या के दस्तो पर अङ्गरेजी तोपखानो ने गोले बरसाये । ठोस और पोले भी जो फटकर तात्या के घुड सवारो का सर्वनाश कर रहे थे । दस्ते तितर-बितर होने लगे । एक ओर काशीबाई पड गई, दूसरी ओर जूही को जाना पडा । काशीबाई वाला बचा खुचा दस्ता अँग्रेज घुडसवारो के बीच में फँस गया । पहले पिस्तौलें चली, फिर तलवार खिची । काशीबाई ने 'हर हर महादेव' कहा और पिल पडी । उसका स्वर कोयल का सा था । अँग्रेज घुडसवार समझ गये कि पुरुष वेश में स्त्री है । उनको भ्रम हुआ । एक बोला, 'रानी है ।'

३६४ झाँसी की रानी दूसरे ने कहा, 'झांसी की रानी । उसको जिन्दा पकड़ो ।' परन्तु काशीबाई की तलवार ने यह मन्सूबा असम्भव कर दिया । ऐसी चलाई कि दो सवार तो अश्व समेत कट गये । कई घायल हो गये परन्तु एक सवार की तलवार से उसका घोडा मारा गया । काशीबाई पैदल लडी । उस स्थिति में भी उसने कई सवारो को घायल किया । अन्त मे—काशीबाई के सिर पर एक तलवार पडी । लोहे की टोपी के कारण सिर बच गया, परन्तु कन्धा कट गया । तो भी काशीबाई शिथिल नही हुई । फिर दूसरी तलवार । काशीबाई का अन्त हो गया—उस समय उसके मुँह से निकला—'हर हर महा......' गोरे प्रसन्न थे । उठाकर रोज़ के पास ले गये । 'यह बहुत लडी हुज़ूर । औरत के शरीर में शैतान है ।' रोज़ ने काशी के शव को पहिचनवाया । पहिचानने वाले ने सिर हिलाकर आश्वासन दिया, 'यह रानी नही है । रानी की बहिन हो या सहेली हो या तात्या की कोई नातेदार ।' रोज़ ने काशी का शव सुरक्षित रक्खा, और तात्या की सेना की ओर ध्यान दिया । पेशवा के दस्तो के पैर उखड़ चुके थे । वे भागे । जूही भी भागकर तात्या के पास पहुची । बोली, 'काशीबाई कही फँस गई है । मारी गई होगी ।' उसी समय रोज़ के गोले तात्या की वेतवा तटवर्ती सेना पर गिरे । तात्या ने जवाब दिया । परन्तु रोज़ के दूसरे अनेक दस्तो ने छोटी हलकी तोपो से उस पर कई पार्श्वों से आक्रमण किया तात्या को अपनी सेना बेतवा पार ले जानी पडी । रोज़ ने पीछा नही छोडा । तात्या की बडी बडी 'तोपे अपने बोझ के कारण बेतवा की रेत मे धस गई । न खिच सकी । तात्या को छोडनी पडी । हार खाकर भागना पडा । रोज़ के दस्तो ने लगभग सोलह मील तक उसका पीछा किया । अङ्गरेजो के हाथ बहुत सामान और तोपखाने लगे । सन्ध्या तक मैदान साफ हो गया । तात्या के पन्द्रह सौ सैनिक मारे गये । वह मुश्किल से एरच घाट होकर कोच होता

हुआ, कई दिन बाद कालपी पहुँच पाया। जूही झाँसी नही लौट सकी। उसको तात्या की टूटी फूटी सेना के साथ कालपी जाना पडा। दूरबीन की सहायता और तोपो की दूर से हट हटकर सुनाई पडने वाली आवाजो से झाँसी वालो को विश्वास हो गया कि तात्या की सेना हार गई। झाँसी में गहरी निराशा के काले बादल छा गये। रोज की सेना के हर्ष का पार न रहा। एक दिन पहले रोज की सेना जब तब कर उठी थी। इस रात विजयश्री मुट्ठी के भीतर दिखलाई पडने लगी। थके मादे सिपहियो को विश्राम दिया गया। सन्ध्या के समय काशीबाई का शव फिर पहिचनवाया गया। ओरछे की सेना के कुछ लोग रानी को अच्छी तरह जानते थे। उन्होने आश्वासन दिया, 'यह रानी नही है।' काशी का शव जला दिया गया। रात में थोडी गोलाबारी जारी रही, परन्तु अधिक समय मोर्चों पर तोपो को यथावत जमाने मे गया। जवाहरसिंह ने रानी को शहर की वार्ता सुनाई। रानी ने अपने सरदारो को इकट्ठा किया। उनसे मुस्करा कर कहा, 'पेशवा की सेना आज लौट गई, तो कल फिर वापस आ सकती है। तात्या असाधारण सेनापति हैं और पेशवा के अधिकार में असंख्य सेना और तोपे हैं। आप लोगो को घबराना नही चाहिये। मान लो कि पेशवा की सेना न आती तो क्या हम लोग हथियार डालकर झाँसी के मुँह पर कालिख पोतते ? अपने पुरखो का स्मरण करो। स्वराज्य की स्थापना में कितने खप गये ! यह आवश्यक नही है कि स्वराज्य की स्थापना हम अपने जीवन-काल में ही देख लें। सीढी के डण्डे पर पैर रखते ही हम छत पर नही पहुच जाते। एक ही त्याग एक ही मरण, एक ही जन्म से स्वराज्य नही मिलता है। स्मरण रक्खो - हमको केवल कर्म करने का अधिकार है, फल पर नही। दृढ उद्देश्य और निरन्तर कर्म-हमारा केवल ध्येय यह है। जीवन कर्त्तव्यपालन का नाम है—कर्त्तव्यपालन

३६६ झांसी की रानी करते हुये मरना जीवन का ही दूसरा नाम है। जो लोग अङ्गरेजो से डरते हो, मौत से डरते हो वे हथियार रखकर आराम के साथ अपने घर चले जाये। जो लोग स्वराज्य के लिये प्राण विसर्जन करना चाहते हो, वे मेरे पास बने रहे।' रानी फिर मुस्कराई। सब लोगो की ओर देखा। किसी ने 'हथियार रखकर आराम के साथ घर जाने' की बात नही कही। सबने लडमरने का रानी को आश्वासन दिया। 'श्रीमन्त सरकार आज रात से ही, अभी से, अपनी घनगरज का काम देखे।' गुलाम गौस ने कहा। भाऊ बख्शी बोला, 'सरकार को सपने में जो देवी दिखलाई दी थी वही मेरी तोप पर काम करेगी। कडक बिजली ने कामासिन पहाडी तक को छार छार न कर दिया तो बात काहे की।' 'सरकार,' खुदाबख्श ने कहा, 'सैयर फाटक पर से अब जो कुछ होगा, उस पर आप को बहुत हर्ष होगा।' मोतीबाई बोली, 'सरकार, मुझको और मेरी सङ्गिनो से अलग मोर्चे दिये जायें और फिर देखा जाय कि स्वराज्य की लडाई के लिये झांसी की स्त्रिया अकेले क्या क्या कर सकती हैं।' बाहर से आये हुये पठानों के सरदार गुलमुहम्मद ने कहा, 'अलहमदुलिल्लाह, हुजूर हम न बहुत समझता है और न बहुत सुनता है। सिर्फ इतना अरज हे कि हम लोग झासी की मिट्टी में मिलेगा और बहिश्त लेगा। सोराज की आप जानो।' रानी ने सरदारो को जी खोलकर पुरस्कार बांटे और उनके सिपाहियो के लिये भी इनाम दिये। मुख्य मुख्य लोगो को रणकंकण अपने हाथ से बाधे और पीठ पर हाथ फेरा। पुरस्कृत केवल तीन व्यक्ति नही हुये, — वे उस समय किले में थे भी नही, — दूल्हाजू, पीरअली और बरहामुद्दीन। निराशा के वातावरण का कुहरा छट गया। उत्साह का तीव्ररवि चढ आया। रात भर विकट, तीक्ष्ण, भीषण गोलबारी किले और बाहर

लक्ष्मीबाई ३६७ की बुर्जो पर से हुई । रोज़ की सेना ने बहुत हल्का जवाब दिया । सैनिक रक्षा के स्थानो में पडे पडे विश्राम करते रहे । यदि उस रात झासी की सेना फाटक खोलकर टूट पडती, तो रोज की सारी सेना नष्टभ्रष्ट हो जाती । झासी का गोलाबारी का शोरगुल अत्यन्त तीव्र हुआ, परन्तु उससे अङ्गरेजी सेना को सापेक्ष में हानि बहुत कम पहुची । रोज़ को आश्चर्य था—झांसी में इतनी युद्ध सामग्री कहा से आ रही है । रानी का वही क्रम जारी था—एक मोर्चे से दूसरे मोर्चे पर पहुचना, निरीक्षण करना और उत्साह प्रदान करना । एक स्थल पर जवाहरसिंह से भेट हो गई । रानी ने पूछा, 'उस मामले की जाच पडताल की ?' जवाहरसिंह ने उत्तर दिया, 'जी हाँ सरकार पीरअली बुरी कसम खाता है । कहता है कि दीवान दूल्हाजू को रक्षा के लिए साथ ले गया था । रात में जो जासूसी उसने की उससे और कुछ पता तो नही लगा, क्योकि रोज़ ने अपनी योजन। केवल अपने मातहत जनरलो की बतलाई थी, परन्तु यह अवश्य मालूम हो गया है कि अङ्गरेजो को अभी तक दो लाख रुपये की तो बारूद ही खर्च करनी पडी है । उनके पास बारूद की कमी हो गई है और गोले भी बहुत नहीं हैं । शायद कलकत्ते से कुमुक मंगवाई है । रानी ने कहा, 'मुझे भासता है अग्ररेज लोग कल विकट युद्ध करेगे । तात्या का जो सामान उन लोगो के हाथ पडा होगा उससे उनको बहुत सहायता मिलेगी । न जाने विचारी काशी और जूही कहा होगी ।' जवाहरसिंह उत्तर ही क्या दे सकता था ? रानी ने एक क्षण सोचकर कहा, 'दीवान दूल्हाजू मिले ? उनसे पूछा ?' 'नही मिले, जवाहरसिंह ने उत्तर दिया, कुमुक बदल गई है । सुन्दरबाई ओर्च्छा फाटक पर है । दीवान साहब कही चले गये हैं ।' 'बरहामुद्दीन ?' रानी ने प्रश्न किया ।

३६८ झांसी की रानी जवाहरसिंह ने जवाब दिया, सागर-खिडकी पर था। मैंने उसको

  • सावधान रहने के लिये झिडक दिया है।' इसी समय किले वाले महल पर जोर का धडाका हुआ। रानी किले की तरफ चली। जवाहरसिंह भी। रानी ने निवारण किया, 'आप शहर के मोर्चों को एक वार फिर देखकर थोडा विश्राम करलो। मै देखती हूँ यह क्या है।' रानी ने किले में जाकर देखा। गोला महल पर पडा था। महल के दो खण्ड नष्ट हो गये। पानी भरने वाले ब्राह्मण और मन्दिरो के पुजारी महल के बीचोबीच नीचे वाले खण्ड में छिपे हुये थे। रानी ने उनको दिलासा दी। खुद महल के बाहर टहलने लगी। दो बज गये थे। गुलाम गौस पश्चिमी तोपखाने पर अन्य तोपचियो के साथ था—लालता मारा जा चुका था। दक्षिणी तोपखाने पर मोतीबाई, पूर्वीय पर भाऊँ बख्शी और केन्द्रीय पर मुन्दर। इन लोगो को महल का हाल बतलाया। उन्होने निशाने साधे। अनुभव से दुश्मन के ठीक स्थलो की सही जानकारी हो गई थी। गोलाबारी से अङ्गरेजी तोपखाने बन्द हो गये। महल में छिपे हुये ब्राह्मण इत्यादि पसीने में तर बाहर निकल आये और सुखपूर्वक सो गये। सवेरे एक चिट्ठी बरहामुद्दीन ने रानी के हाथ मे दी। वह उसका इस्तीफा था। उसमें लिखा था. - 'मेरा विश्वास नही किया गया। मुझको उल्टा डाटा-फटकारा गया। मेरा मन काम मे नही लगता। मैं नौकरी छोड़ता हूँ। हथियार पीरअली को दे दिये हैं। पीरअली और दूल्हाजू से होशियार रहियेगा।' रानी को क्रोध आने को हुआ, परन्तु उन्होने सयम कर लिया। बोली, 'ऐन समय पर तुम जैसे लोग ही काम छोड़ते हैं। जाओ हटो।' और चिट्ठी उन्होने अपने अङ्गरखे की जेब मे रख ली।

लक्ष्मीबाई ३६६ [ ७४ ] दूसरे दिन जैसा युद्ध हुआ उससे रोज की सेना के छक्के छूट गये । बहुत उपाय करने पर भी रोज उस दिन एक अगुल बराबर भी सफलता प्राप्त न कर सका । नित्य की वही कहानी-दीवारो में छेद हुये, बुर्जो की मुडेरे जगह-जगह पर टूटी, शहर में मकान ध्वस्त हुये, आगें लगी, कुछ लोग मरे, दीवारो और बुर्जो की मरम्मत तुरन्त कर ली गई, आगे बुझा ली गई, लोगो के मरने से जीवितो में और अधिक हिंसा जागी और दृढता वढी । रात को भी वही क्रम । युद्ध की भयकरता ने स्थिरता पकड ली । वह झांसी वालो के जीवन में एक नित्य की बात हो गई । रानी ओर्छा फाटक पर पहुँची । दूल्हाजू अभी ठिये से हटा न था । सुन्दर भी मौजूद थी । रानी ने यकायक पूछा, 'दूल्हाजू, तुम पीरअली के साथ अंग्रेज छावनी में कभी गये ?' 'अंग्रेज छावनी में में...मैं,' रुंधे गले से दूल्हाजू ने जवाब दिया, 'में सरकार कब ?' रानी—'कभी सही । गये या नही ?' दूल्हाजू—'में ! मैं . तो, कभी...कहा . गया !' रानी—'नहीं गये ?' दूल्हाजू—'नही सरकार ।' रानी—'पीरअली कहता है कि तुम उसके साथ गये थे ।' दूल्हाजू—'वह झूठ बोलता है, सरकार ।' रानी—'सम्भव है । और यह लाल झण्डा क्या है ?' दूल्हाजू—'लाल झण्डा ! लाल कैसा ? झण्डा क्या सरकार ?' रानी—'घबराओ मत, में लाल झण्डे की सब बात जानती हूँ ।' दूल्हाजू—'में थक गया हूँ सरकार । दिमाग काम नही कर रहा है । कुछ समझ में नहीं आ रहा है । लाल झण्डा ! पीरअली बडा बेईमान और झूठा है ।'