भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 410, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 410

लक्ष्मीबाई ३६६ [ ७४ ] दूसरे दिन जैसा युद्ध हुआ उससे रोज की सेना के छक्के छूट गये । बहुत उपाय करने पर भी रोज उस दिन एक अगुल बराबर भी सफलता प्राप्त न कर सका । नित्य की वही कहानी-दीवारो में छेद हुये, बुर्जो की मुडेरे जगह-जगह पर टूटी, शहर में मकान ध्वस्त हुये, आगें लगी, कुछ लोग मरे, दीवारो और बुर्जो की मरम्मत तुरन्त कर ली गई, आगे बुझा ली गई, लोगो के मरने से जीवितो में और अधिक हिंसा जागी और दृढता वढी । रात को भी वही क्रम । युद्ध की भयकरता ने स्थिरता पकड ली । वह झांसी वालो के जीवन में एक नित्य की बात हो गई । रानी ओर्छा फाटक पर पहुँची । दूल्हाजू अभी ठिये से हटा न था । सुन्दर भी मौजूद थी । रानी ने यकायक पूछा, 'दूल्हाजू, तुम पीरअली के साथ अंग्रेज छावनी में कभी गये ?' 'अंग्रेज छावनी में में...मैं,' रुंधे गले से दूल्हाजू ने जवाब दिया, 'में सरकार कब ?' रानी—'कभी सही । गये या नही ?' दूल्हाजू—'में ! मैं . तो, कभी...कहा . गया !' रानी—'नहीं गये ?' दूल्हाजू—'नही सरकार ।' रानी—'पीरअली कहता है कि तुम उसके साथ गये थे ।' दूल्हाजू—'वह झूठ बोलता है, सरकार ।' रानी—'सम्भव है । और यह लाल झण्डा क्या है ?' दूल्हाजू—'लाल झण्डा ! लाल कैसा ? झण्डा क्या सरकार ?' रानी—'घबराओ मत, में लाल झण्डे की सब बात जानती हूँ ।' दूल्हाजू—'में थक गया हूँ सरकार । दिमाग काम नही कर रहा है । कुछ समझ में नहीं आ रहा है । लाल झण्डा ! पीरअली बडा बेईमान और झूठा है ।'