झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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३६८ झांसी की रानी जवाहरसिंह ने जवाब दिया, सागर-खिडकी पर था। मैंने उसको
- सावधान रहने के लिये झिडक दिया है।' इसी समय किले वाले महल पर जोर का धडाका हुआ। रानी किले की तरफ चली। जवाहरसिंह भी। रानी ने निवारण किया, 'आप शहर के मोर्चों को एक वार फिर देखकर थोडा विश्राम करलो। मै देखती हूँ यह क्या है।' रानी ने किले में जाकर देखा। गोला महल पर पडा था। महल के दो खण्ड नष्ट हो गये। पानी भरने वाले ब्राह्मण और मन्दिरो के पुजारी महल के बीचोबीच नीचे वाले खण्ड में छिपे हुये थे। रानी ने उनको दिलासा दी। खुद महल के बाहर टहलने लगी। दो बज गये थे। गुलाम गौस पश्चिमी तोपखाने पर अन्य तोपचियो के साथ था—लालता मारा जा चुका था। दक्षिणी तोपखाने पर मोतीबाई, पूर्वीय पर भाऊँ बख्शी और केन्द्रीय पर मुन्दर। इन लोगो को महल का हाल बतलाया। उन्होने निशाने साधे। अनुभव से दुश्मन के ठीक स्थलो की सही जानकारी हो गई थी। गोलाबारी से अङ्गरेजी तोपखाने बन्द हो गये। महल में छिपे हुये ब्राह्मण इत्यादि पसीने में तर बाहर निकल आये और सुखपूर्वक सो गये। सवेरे एक चिट्ठी बरहामुद्दीन ने रानी के हाथ मे दी। वह उसका इस्तीफा था। उसमें लिखा था. - 'मेरा विश्वास नही किया गया। मुझको उल्टा डाटा-फटकारा गया। मेरा मन काम मे नही लगता। मैं नौकरी छोड़ता हूँ। हथियार पीरअली को दे दिये हैं। पीरअली और दूल्हाजू से होशियार रहियेगा।' रानी को क्रोध आने को हुआ, परन्तु उन्होने सयम कर लिया। बोली, 'ऐन समय पर तुम जैसे लोग ही काम छोड़ते हैं। जाओ हटो।' और चिट्ठी उन्होने अपने अङ्गरखे की जेब मे रख ली।