झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३६७ की बुर्जो पर से हुई । रोज़ की सेना ने बहुत हल्का जवाब दिया । सैनिक रक्षा के स्थानो में पडे पडे विश्राम करते रहे । यदि उस रात झासी की सेना फाटक खोलकर टूट पडती, तो रोज की सारी सेना नष्टभ्रष्ट हो जाती । झासी का गोलाबारी का शोरगुल अत्यन्त तीव्र हुआ, परन्तु उससे अङ्गरेजी सेना को सापेक्ष में हानि बहुत कम पहुची । रोज़ को आश्चर्य था—झांसी में इतनी युद्ध सामग्री कहा से आ रही है । रानी का वही क्रम जारी था—एक मोर्चे से दूसरे मोर्चे पर पहुचना, निरीक्षण करना और उत्साह प्रदान करना । एक स्थल पर जवाहरसिंह से भेट हो गई । रानी ने पूछा, 'उस मामले की जाच पडताल की ?' जवाहरसिंह ने उत्तर दिया, 'जी हाँ सरकार पीरअली बुरी कसम खाता है । कहता है कि दीवान दूल्हाजू को रक्षा के लिए साथ ले गया था । रात में जो जासूसी उसने की उससे और कुछ पता तो नही लगा, क्योकि रोज़ ने अपनी योजन। केवल अपने मातहत जनरलो की बतलाई थी, परन्तु यह अवश्य मालूम हो गया है कि अङ्गरेजो को अभी तक दो लाख रुपये की तो बारूद ही खर्च करनी पडी है । उनके पास बारूद की कमी हो गई है और गोले भी बहुत नहीं हैं । शायद कलकत्ते से कुमुक मंगवाई है । रानी ने कहा, 'मुझे भासता है अग्ररेज लोग कल विकट युद्ध करेगे । तात्या का जो सामान उन लोगो के हाथ पडा होगा उससे उनको बहुत सहायता मिलेगी । न जाने विचारी काशी और जूही कहा होगी ।' जवाहरसिंह उत्तर ही क्या दे सकता था ? रानी ने एक क्षण सोचकर कहा, 'दीवान दूल्हाजू मिले ? उनसे पूछा ?' 'नही मिले, जवाहरसिंह ने उत्तर दिया, कुमुक बदल गई है । सुन्दरबाई ओर्च्छा फाटक पर है । दीवान साहब कही चले गये हैं ।' 'बरहामुद्दीन ?' रानी ने प्रश्न किया ।