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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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३६६ झांसी की रानी करते हुये मरना जीवन का ही दूसरा नाम है। जो लोग अङ्गरेजो से डरते हो, मौत से डरते हो वे हथियार रखकर आराम के साथ अपने घर चले जाये। जो लोग स्वराज्य के लिये प्राण विसर्जन करना चाहते हो, वे मेरे पास बने रहे।' रानी फिर मुस्कराई। सब लोगो की ओर देखा। किसी ने 'हथियार रखकर आराम के साथ घर जाने' की बात नही कही। सबने लडमरने का रानी को आश्वासन दिया। 'श्रीमन्त सरकार आज रात से ही, अभी से, अपनी घनगरज का काम देखे।' गुलाम गौस ने कहा। भाऊ बख्शी बोला, 'सरकार को सपने में जो देवी दिखलाई दी थी वही मेरी तोप पर काम करेगी। कडक बिजली ने कामासिन पहाडी तक को छार छार न कर दिया तो बात काहे की।' 'सरकार,' खुदाबख्श ने कहा, 'सैयर फाटक पर से अब जो कुछ होगा, उस पर आप को बहुत हर्ष होगा।' मोतीबाई बोली, 'सरकार, मुझको और मेरी सङ्गिनो से अलग मोर्चे दिये जायें और फिर देखा जाय कि स्वराज्य की लडाई के लिये झांसी की स्त्रिया अकेले क्या क्या कर सकती हैं।' बाहर से आये हुये पठानों के सरदार गुलमुहम्मद ने कहा, 'अलहमदुलिल्लाह, हुजूर हम न बहुत समझता है और न बहुत सुनता है। सिर्फ इतना अरज हे कि हम लोग झासी की मिट्टी में मिलेगा और बहिश्त लेगा। सोराज की आप जानो।' रानी ने सरदारो को जी खोलकर पुरस्कार बांटे और उनके सिपाहियो के लिये भी इनाम दिये। मुख्य मुख्य लोगो को रणकंकण अपने हाथ से बाधे और पीठ पर हाथ फेरा। पुरस्कृत केवल तीन व्यक्ति नही हुये, — वे उस समय किले में थे भी नही, — दूल्हाजू, पीरअली और बरहामुद्दीन। निराशा के वातावरण का कुहरा छट गया। उत्साह का तीव्ररवि चढ आया। रात भर विकट, तीक्ष्ण, भीषण गोलबारी किले और बाहर