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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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हुआ, कई दिन बाद कालपी पहुँच पाया। जूही झाँसी नही लौट सकी। उसको तात्या की टूटी फूटी सेना के साथ कालपी जाना पडा। दूरबीन की सहायता और तोपो की दूर से हट हटकर सुनाई पडने वाली आवाजो से झाँसी वालो को विश्वास हो गया कि तात्या की सेना हार गई। झाँसी में गहरी निराशा के काले बादल छा गये। रोज की सेना के हर्ष का पार न रहा। एक दिन पहले रोज की सेना जब तब कर उठी थी। इस रात विजयश्री मुट्ठी के भीतर दिखलाई पडने लगी। थके मादे सिपहियो को विश्राम दिया गया। सन्ध्या के समय काशीबाई का शव फिर पहिचनवाया गया। ओरछे की सेना के कुछ लोग रानी को अच्छी तरह जानते थे। उन्होने आश्वासन दिया, 'यह रानी नही है।' काशी का शव जला दिया गया। रात में थोडी गोलाबारी जारी रही, परन्तु अधिक समय मोर्चों पर तोपो को यथावत जमाने मे गया। जवाहरसिंह ने रानी को शहर की वार्ता सुनाई। रानी ने अपने सरदारो को इकट्ठा किया। उनसे मुस्करा कर कहा, 'पेशवा की सेना आज लौट गई, तो कल फिर वापस आ सकती है। तात्या असाधारण सेनापति हैं और पेशवा के अधिकार में असंख्य सेना और तोपे हैं। आप लोगो को घबराना नही चाहिये। मान लो कि पेशवा की सेना न आती तो क्या हम लोग हथियार डालकर झाँसी के मुँह पर कालिख पोतते ? अपने पुरखो का स्मरण करो। स्वराज्य की स्थापना में कितने खप गये ! यह आवश्यक नही है कि स्वराज्य की स्थापना हम अपने जीवन-काल में ही देख लें। सीढी के डण्डे पर पैर रखते ही हम छत पर नही पहुच जाते। एक ही त्याग एक ही मरण, एक ही जन्म से स्वराज्य नही मिलता है। स्मरण रक्खो - हमको केवल कर्म करने का अधिकार है, फल पर नही। दृढ उद्देश्य और निरन्तर कर्म-हमारा केवल ध्येय यह है। जीवन कर्त्तव्यपालन का नाम है—कर्त्तव्यपालन