झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ झाँसी की रानी दूसरे ने कहा, 'झांसी की रानी । उसको जिन्दा पकड़ो ।' परन्तु काशीबाई की तलवार ने यह मन्सूबा असम्भव कर दिया । ऐसी चलाई कि दो सवार तो अश्व समेत कट गये । कई घायल हो गये परन्तु एक सवार की तलवार से उसका घोडा मारा गया । काशीबाई पैदल लडी । उस स्थिति में भी उसने कई सवारो को घायल किया । अन्त मे—काशीबाई के सिर पर एक तलवार पडी । लोहे की टोपी के कारण सिर बच गया, परन्तु कन्धा कट गया । तो भी काशीबाई शिथिल नही हुई । फिर दूसरी तलवार । काशीबाई का अन्त हो गया—उस समय उसके मुँह से निकला—'हर हर महा......' गोरे प्रसन्न थे । उठाकर रोज़ के पास ले गये । 'यह बहुत लडी हुज़ूर । औरत के शरीर में शैतान है ।' रोज़ ने काशी के शव को पहिचनवाया । पहिचानने वाले ने सिर हिलाकर आश्वासन दिया, 'यह रानी नही है । रानी की बहिन हो या सहेली हो या तात्या की कोई नातेदार ।' रोज़ ने काशी का शव सुरक्षित रक्खा, और तात्या की सेना की ओर ध्यान दिया । पेशवा के दस्तो के पैर उखड़ चुके थे । वे भागे । जूही भी भागकर तात्या के पास पहुची । बोली, 'काशीबाई कही फँस गई है । मारी गई होगी ।' उसी समय रोज़ के गोले तात्या की वेतवा तटवर्ती सेना पर गिरे । तात्या ने जवाब दिया । परन्तु रोज़ के दूसरे अनेक दस्तो ने छोटी हलकी तोपो से उस पर कई पार्श्वों से आक्रमण किया तात्या को अपनी सेना बेतवा पार ले जानी पडी । रोज़ ने पीछा नही छोडा । तात्या की बडी बडी 'तोपे अपने बोझ के कारण बेतवा की रेत मे धस गई । न खिच सकी । तात्या को छोडनी पडी । हार खाकर भागना पडा । रोज़ के दस्तो ने लगभग सोलह मील तक उसका पीछा किया । अङ्गरेजो के हाथ बहुत सामान और तोपखाने लगे । सन्ध्या तक मैदान साफ हो गया । तात्या के पन्द्रह सौ सैनिक मारे गये । वह मुश्किल से एरच घाट होकर कोच होता