भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 405

३६४ झाँसी की रानी दूसरे ने कहा, 'झांसी की रानी । उसको जिन्दा पकड़ो ।' परन्तु काशीबाई की तलवार ने यह मन्सूबा असम्भव कर दिया । ऐसी चलाई कि दो सवार तो अश्व समेत कट गये । कई घायल हो गये परन्तु एक सवार की तलवार से उसका घोडा मारा गया । काशीबाई पैदल लडी । उस स्थिति में भी उसने कई सवारो को घायल किया । अन्त मे—काशीबाई के सिर पर एक तलवार पडी । लोहे की टोपी के कारण सिर बच गया, परन्तु कन्धा कट गया । तो भी काशीबाई शिथिल नही हुई । फिर दूसरी तलवार । काशीबाई का अन्त हो गया—उस समय उसके मुँह से निकला—'हर हर महा......' गोरे प्रसन्न थे । उठाकर रोज़ के पास ले गये । 'यह बहुत लडी हुज़ूर । औरत के शरीर में शैतान है ।' रोज़ ने काशी के शव को पहिचनवाया । पहिचानने वाले ने सिर हिलाकर आश्वासन दिया, 'यह रानी नही है । रानी की बहिन हो या सहेली हो या तात्या की कोई नातेदार ।' रोज़ ने काशी का शव सुरक्षित रक्खा, और तात्या की सेना की ओर ध्यान दिया । पेशवा के दस्तो के पैर उखड़ चुके थे । वे भागे । जूही भी भागकर तात्या के पास पहुची । बोली, 'काशीबाई कही फँस गई है । मारी गई होगी ।' उसी समय रोज़ के गोले तात्या की वेतवा तटवर्ती सेना पर गिरे । तात्या ने जवाब दिया । परन्तु रोज़ के दूसरे अनेक दस्तो ने छोटी हलकी तोपो से उस पर कई पार्श्वों से आक्रमण किया तात्या को अपनी सेना बेतवा पार ले जानी पडी । रोज़ ने पीछा नही छोडा । तात्या की बडी बडी 'तोपे अपने बोझ के कारण बेतवा की रेत मे धस गई । न खिच सकी । तात्या को छोडनी पडी । हार खाकर भागना पडा । रोज़ के दस्तो ने लगभग सोलह मील तक उसका पीछा किया । अङ्गरेजो के हाथ बहुत सामान और तोपखाने लगे । सन्ध्या तक मैदान साफ हो गया । तात्या के पन्द्रह सौ सैनिक मारे गये । वह मुश्किल से एरच घाट होकर कोच होता