झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ३६३ निपुण तोपची मारे गये हैं और अब कच्चे आदमी काम कर रहे हैं । रानी सहमत नही हुई । उन्होने कहा, 'अङ्गरेजो के सामने कोई नई दुविधा आ गई है । सेना और तोपखानो को बाट दिया गया है, और कोई बात नही ।' रानी ने बडी दूरबीन उठाई । झासी की ओर आने वाले तात्या के दस्तो को दूरी पर देखा । मुस्कराकर दूरबीन जवाहरसिंह के हाथ में दी । बोली, 'अब झासी का उद्धार निकट है ।' जवाहरसिंह दूरबीन से देखकर उछल पडा । झासी भर में समाचार फैल गया कि झासी की सहायता के लिये पेशवा की सेना आ गई । झासी से दिन भर गोलाबारी बहुत हल्की रही । लालता ने सम्मति दी, 'हमारे गोले कही पेशवा की सेना पर न पडे ।' और गोलन्दाजो का भी यही मत था । पूर्व और उत्तर के तोपखाने करीब करीब बन्द रहे । केवल पश्चिम और दक्षिण के तोपखाने कुछ काम करते रहे । झासी की दिन भर की आशा सन्ध्या समय निराशा में परिवर्तित होने को थी । टोरियो के बीचो बीच आते ही तात्या के दस्तो पर अङ्गरेजी तोपखानो ने गोले बरसाये । ठोस और पोले भी जो फटकर तात्या के घुड सवारो का सर्वनाश कर रहे थे । दस्ते तितर-बितर होने लगे । एक ओर काशीबाई पड गई, दूसरी ओर जूही को जाना पडा । काशीबाई वाला बचा खुचा दस्ता अँग्रेज घुडसवारो के बीच में फँस गया । पहले पिस्तौलें चली, फिर तलवार खिची । काशीबाई ने 'हर हर महादेव' कहा और पिल पडी । उसका स्वर कोयल का सा था । अँग्रेज घुडसवार समझ गये कि पुरुष वेश में स्त्री है । उनको भ्रम हुआ । एक बोला, 'रानी है ।'