झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 403, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंतात्या—'आप लोग हमारे साथ सुरक्षित रहेगे।' काशीबाई—'हम लोग भी लडना जानते हैं।' जूही—'जानती हैं।' और वह मुसकराई। तात्या ने हँसकर कहा, 'उसी भाषा में बोलिये। मैं सैनिको का भी सन्देह जाग्रत नही करना चाहता हू।' तात्या ने उसी दिन कूच कर दिया। साथ में बीस सहस्त्र सेना। बाकी सेना और कालपी का प्रबन्ध रावसाहब के हाथ में छोड दिया। तात्या को झासी तक पहुँचने में कुछ समय लगा। परन्तु उसके पहुँचने के पहले ही रोज को पता लग गया कि एक बडी सेना और भारी तोपें लिये हुये तात्या झासी की सहायता के लिये आ रहा है। रोज चिन्तित हुआ। उसने अपने यूथनायको और दलनायको की सम्मति से एक योजना बनाई। प्रत्येक मोर्चे के तोपखानो से एक एक तोप ली। केवल जरूरी सेना झासी के इर्द गिर्द छोडकर, बाकी के कई दस्ते बनाये। कुछ को झांसी कालपी का मार्ग रुद्ध करने के लिये झासी से सात मील दिगारा की दुतर्फा टौरियो पर भेज कर छिपा दिया। कुछ उत्तर की ओर दस मील पर गढमऊ की झील की पहाडियो पर। कुछ को कामासिन टौरिया और ओरछा के मार्ग के अगल बगल जमा दिया। तात्या ने अपनी सेना का [बडा भाग अपने पास बेतवा से झासी की ओर दो मील पर नदी के किनारे नोहट घाट और तिलैथा घाट के बीच में रक्खा और बडी बडी तोपें। बाकी सेना को तीन भागो में विभक्त करके गढमऊ की ओर दिगारा की टौरियो की बीच में होकर झासी की ओर भेजा। इन दस्तो के पास छोटी तोपे थी। साथ में काशी और जूही थी। पहली एप्रेल का प्रातः काल हुआ। झासी पर बन्दूकचियो के हमले तो बिलकुल नही हुये, परन्तु गोलाबारी भयानक हुई। गोलो के ठीक निशाने नही पड रहे थे। साफ था कि अङ्गरेजी तोपखाने अपना बरकाव कर रहे हैं और झासी वालो को केवल व्यस्त रखना उनका उद्देश्य है। परन्तु जवाहरसिंह ने इसका यह अर्थ लगाया कि अग्रेजो के