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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 402

लक्ष्मीबाई ३६१ [ ७३ ] तात्या टोपे चरखारी को जीतकर कालपी लौटा। उसकी सेना में ग्वालियर का वह यूथ भी था जिसने कानपुर में जनरल विढम को पराजित करने में हाथ बटाया था। सिपाही विजयोत्सव मना रहे थे और तात्या कालपी के विशाल शस्त्रागार का निरीक्षण कर रहा था। भांति भांति के गोले ढाले जा रहे थे। बन्दूकें बनाई और बाधी जा रही थी। दो हजार मन बारूद के होते हुये भी और बारूद तेजी के साथ तैयार की जा रही थी। अन्य प्रकार के शस्त्र और उनके अङ्गोपाङ्ग बनाये और खराद मशीनो पर संभाले जा रहे थे। बहुत सी मशीने नई विलायती थी। उसी समय दो सवार पहरे वालो के पास उतरे। दोनो सुन्दर युवक जुल्फो पर साफा बाधे हुये। पहरे वालो से कहा, 'सरदार साहब से इसी समय मिलना है।' झांसी की रानी साहब की चिट्ठी लाये हैं।' उन लोगो ने झांसी के युद्ध की गति के विषय में जिज्ञासा की। युवको ने संक्षेप में बतला दिया। शीघ्र ही दोनो तात्या के सामने पहुचा दिये गये। तात्या ने अकेले में ले जाकर कहा, 'एक साहब को तो पहिचानता हूँ दूसरे साहब—?' जूही ने उत्तर दिया, 'आप काशीबाई जी हैं।' तात्या ने अभिवादन किया। दोनो से झांसी के युद्ध का वृत्तान्त जितना उनके सामने हो चुका था और जो उन्होने मार्ग के बटोहियो से सुना था विस्तार पूर्वक सुना दिया। रानी की चिट्ठी भी पढी। तात्या बोला, 'आज ही झाँसी की ओर कूच करता हू। सेना को चरखारी से लौट कर काफी विश्राम मिल चुका है। आप लोग हमारे साथ चलिये। अब अकेले लौटना ठीक नही है।' काशीबाई ने कहा, 'फाटक बन्द हो चुके हैं। चारो ओर अंग्रेजो का कड़ा पहरा है।'