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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४०० झांसी की रानी सुन्दर—'आज इनसे तोप ठीक नही चली।' 'ये मुझ से व्यर्थ रुष्ट हैं। इनको बराबर प्रसन्न रखने का प्रयत्न करता हू।' रानी—'कोई बात नही। कल ठीक ठीक काम करना। सुन्दर साथ है। वह सहायता करेगी।' रानी को बरहामुद्दीन याद आ गया। वह और अधिक इस्तीफे नही चाहती थी। सुन्दर बोली, 'इनको किले में रख लीजिए। मैं आज रात और कल दिन भर तोपखाना सभाले रहूँगी।' रानी ने कहा, 'आज रात आराम के साथ काम कर लो, कल दिन में अवकाश नही मिलेगा। कल रात इस मोर्चे का ऐसा प्रबन्ध करूंगी जिसमें तुम दोनो को काफी विश्राम मिल जाय।' रानी सागर खिडकी पर पहुंची। उस समय पीरअली कार्यभार अपने स्थानापन्न को सोप रहा था। उनको देखते ही हडबडा गया। रानी ने कहा, 'दूल्हाजू कहते हैं कि कल तुम्हारे साथ कभी बाहर नही गये। तुमने दीवान जवाहरसिंह से कहा कि तुम्हारे साथ गये थे?' पीरअली ने हिम्मत बांधी। बोला, वे मेरे साथ जरूर गये सरकार। डर के मारे उन्होने सच्ची बात नही कही। व्यर्थ झूठ बोले। मैं उनके मुह पर कह सकता हूँ। दिशा मैदान के बाद हाजिर हो जाऊंगा।' रानी ने कहा, कोई जल्दी नही थोडी देर में किले पर आओ।' 'बहुत अच्छा हुजूर,' पीरअली ने मुक्ति की सास लेकर कहा। रानी पूर्व और उत्तरी फाटको पर होती हुई उन्नाव फाटक पर आई। यहा पूरन कोरी अन्य कोरियो के साथ तोप पर था। कोरियो को शाबाशी दी। पूरन से पूछा, 'झलकारी कहा है ? अच्छी तरह तो है ?'