झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 412, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४०१ 'सरकार,' पूरन ने कहा, 'घरै है। अबई बुलाउत, दिन भर इतै काम करत रई, अबई थोडी देर भई जब गई।' 'नही बुलाओ मत।' रानी बोली, 'वैसे ही पूछा।' वे आगे बढ़ गईं। सब फाटको से घूमती हुई हलवाई पुरे में आईं। बाजार का चौधरी मिला। लखपतियो में से था। यह सबेरे इतने पानी से हाथ-मुंह धोया करता था कि पानी सौ सवासौ गज तक बह जाता था। रानी ने मुस्करा कर कहा, अब भी उतने ही पानी से हाथ धोते हो?' 'सरकार,' चौधरी ने उत्तर दिया, 'आज कल सब ब्योपार बन्द है।' मुँह हाथ धोते धोते इतने व्योपारियो से बात करनी पडती थी कि पानी बहाने का ध्यान ही न रहता था।' रानी ने कहा, 'अब ब्योपार के साथ पानी बहाना भी बन्द है।' उस महा कठिन परिस्थिति में भी रानी की इस बात पर बाजार वाले हँसे, हँसते रहे और विपत्ति में धैर्य और साहस पाते रहे। जो मिला, उससे कोई न कोई मीठी बात कह कर, ढाढस बँधाती हुई रानी किले पर लौट आईं। गोलाबारी का वही क्रम जारी था। रात समाप्त हुई। रानी ने सबेरा होते ही सिपाहियो और उनके सरदारो में समाचार भेजा — आज मैं स्वयं अपने लोगो के लिए कलेवा तैयार करू गी। खूब खाओ और डट कर लडो।' सुनते ही थके मादे और मृत सिपाहियो तक की छातिया फूल उठी। ब्राह्मणो ने आटा रांधा। रानी ने उसमें हाथ लगाया। ब्राह्मणो ने ही पूडिया सेकी। रानी ने उसमें भी सहयोग दिया। किले के भीतर वाले सरदारो को उन्होने अपने हाथ से उनके ठियो पर जा जाकर कलेवा वितरित किया।