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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 413

४०२ झांसी की रानी हर्ष और अभिमान के मारे वे सब के सब उन्मत्त हो गये । रानी की छुई हुई पूडी तक के एक एक टुकडे को पगडी के, अगरखे के छोर में कस के बाध लिया । और कसकर बाधे—प्राणो की गाठ में प्रण । रानी को पीरअली का स्मरण आया—भूलती तो वे कभी कुछ थी ही नही । बुलवाया । मालूम हुआ कि दिशा मैदान के लिए जाने के बाद फिर नही दिखलाई पडा; यह भी पता लगा कि दिशा निस्तार के लिये मुहरी के रास्ते से गया था । रानी एक क्षण के लिये असमजस में पडी । उनको विश्वास हो गया कि पीरअली, झूठ बोलता है, और कदाचित् दूल्हाजू सच, परन्तु बरहामुद्दीन ने लिखकर दिया था— पीरअली और दूल्हाजू से होशियार रहियेगा । किसी निश्चय पर पहुँच चुकी थी कि चारो दिशाओ से अंग्रेजो ने गोलाबारी शुरू कर दी ।