झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०२ झांसी की रानी हर्ष और अभिमान के मारे वे सब के सब उन्मत्त हो गये । रानी की छुई हुई पूडी तक के एक एक टुकडे को पगडी के, अगरखे के छोर में कस के बाध लिया । और कसकर बाधे—प्राणो की गाठ में प्रण । रानी को पीरअली का स्मरण आया—भूलती तो वे कभी कुछ थी ही नही । बुलवाया । मालूम हुआ कि दिशा मैदान के लिए जाने के बाद फिर नही दिखलाई पडा; यह भी पता लगा कि दिशा निस्तार के लिये मुहरी के रास्ते से गया था । रानी एक क्षण के लिये असमजस में पडी । उनको विश्वास हो गया कि पीरअली, झूठ बोलता है, और कदाचित् दूल्हाजू सच, परन्तु बरहामुद्दीन ने लिखकर दिया था— पीरअली और दूल्हाजू से होशियार रहियेगा । किसी निश्चय पर पहुँच चुकी थी कि चारो दिशाओ से अंग्रेजो ने गोलाबारी शुरू कर दी ।