भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 414

लक्ष्मीबाई ४०३ [ ७५ ] रानी ने झटपट दलपतियो और गोलन्दाजो को यथोचित आज्ञाये दी। अङ्गरेजो का निश्चय जान पडता था कि कही से भी परकोटे की दीवार को फोडे और झासी में घुस पडे और झासी वालो का निश्चय था कि जब तक शरीर में रक्त है तब तक दुश्मन का पैर झासी के भीतर न पडने देगे। झासी की गोलाबारी से आकाश में चलते हुये गोलो की आग की चादर तन गई। इस चादर मे से अँग्रेज़ी सेना के सिर पर फटे हुये गोलो से गोलिया, कीले-किर्चें बरसती थी। भूनकर खाक कर डालने वाली हवाइया विस्फोट कर रही थी। दक्षिणी मोर्चे पर, जीवनशाह की टौरिया से लेकर ओर्छा फाटक के सामने वाली टेक* तक अँग्रेजी तोपखाने अत्यन्त वेग के साथ जवाब दे रहे थे। अपने तोपखानो की रक्षा मे अँग्रेज बन्दूकची जीवनशाह की टौरिया से ओर्छा फाटक की टेकडी के बीच में सबरे बाघकर ओर्छा फाटक और सैयर फाटक की ओर बढे। परकोटे की बुर्जों और कोट की दीवार के छेदो में से बन्दूको और हलकी तोपो ने यमराज के शापो को उगला। अँग्रेजी पल्टन बिछने लगी। पैर उखडे। पीछे भागने को हुई परन्तु उस क्रिया में भी उद्धार न पाकर मार्ग के पत्थरो की ओट मे छिप गई। लेकिन एक दस्ता ओर्छा फाटक की ओर बढ आया। अँग्रेजी तोपखाने ने भीषणतर गोलाबारी आरम्भ की। सैयर फाटक की ओर भी एक दस्ता बढा। रानी और मोतीबाई ने दूरबीन से देखा। ओर्छा फाटक के सामने वाली टेक के पीछे लाल झण्डा उठा। ओर्छा फाटक पर का तोपखाना कुछ धीमा पडा। 'सरकार,' मोतीबाई ने अनुनय किया, 'मुझको उस ओर जाने दीजिये। सुन्दर अकेली है। दूल्हाजू के हाथ पाव ढीले हो गये हैं।' *अब इस पर मैकडानैल हाई स्कूल और बोर्डिगहाउस बन गये हैं।