झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'जाओ मोती । हीरा बनकर लौटना' रानी ने कहा । मोतीबाई चली गई । खुदाबख्श सैयर फाटक पर था । उसने मोती- बाई को आगे नही बढने दिया । बोला, 'ओर्छा फाटक पर मत जाओ । यही मेरे साथ रहो आज मै अपने देश, अपनी रानी का नमक अदा करूंगा । मरूगा । मेरी लाश को ठिकाने लगा देना ।' मोतीबाई का चेहरा कुम्हलाया हुआ था, परन्तु उसके सौन्दर्य की किरणे छुटकी पड़ रही थी । आखो में आसू आ गये । तोप पर पलीता डालते डालते खुदाबख्श ने चिल्लाकर कहा, 'यह वक्त आसुओ का है ?' मोतीबाई ने बारूद की कालोच वाले हाथो से आसू मसल डाले । बोली, 'नही । अब आसू नहीं आवेंगे ।' खुदाबख्श ने उमग के साथ कहा, 'आज मै आपका, हमेशा के लिये, कैदी हो गया ।' मोतीबाई आख मिलाकर बोली, 'और हमेशा के लिये मैं आपकी ।' खुदाबख्श ने देखा कि रास्ते पर गोरे फाटक की ओर बढे चले आ रहे हैं । तोपो और बन्दूको की बाढ हुई । खुदाबख्श ने मोतीबाई को आदेश दिया, 'दाहिने हाथ की पूरी सतर तक बन्दूके, पत्थर, कटे हुये पेड़ो के लक्कड इन लोगो के सिर पर पटकवाओ । दौडो । अँग्रेज वहा से सीढी लगाकर चढने का उपाय कर रहे हैं ।' मोतीबाई दौडी । सीढी लगाने का उपाय करने वाले सब के सब मारे गये—उनके ऊपर गोलियां, पत्थरो के बडे बडे ढोके और कटे हुये पेड़ो के लक्कड जो वहां पहले से जमा थे बरसाये गये । शहर और किले से ढोल, ताशे और तुरही का कान फोडने वाला नाद हुआ । अग्रेजो ने अपनी पैदल पल्टन को वापिस बुलाने का बिगुल बजाया । पल्टन गिरते- मरते लौट पडी ।