भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई ४०५ रोज़ जीवनशाह की टौरिया के पीछे घोड़े पर था और उसके मातहत अफ़सर बगल में । रोज़ ने कहा, 'नाऊ आर नैव्हर ( या तो अभी या कभी नही ) ।' तार से यह आदेश ओर्छा फाटक टेक और जार पहाड़ी के तोपखानो को दिया गया । ओर्छा फाटक टेक ने इसका जो अर्थ लगाया वह लाल झंडे को और ऊँचा करना था । इधर रोज़ के चार अफ़सर—चारो लैफ़्टिनेट—यौवन प्रमत्त— टेकडियो, पत्थरो और अपनी तोपो की बाढो की आड़े लेते हुए सैयरफाटक की दाहिनी बगल की टेक की दीवार के नीचे पहुँच गये । उस जगह दीवार थोड़ी देर पहले ही आधी ध्वस्त हो गई थी । साथ ही उस जगह वाले झांसी के सैनिक मारे गये थे । इन अफ़सरो में से दो ने अपनी देह की सीडी बनाई । उन पर-से-बाकी दोनो चढ़ गये । इन दोनो ने अपनी सेना के एक दस्ते को सकेत किया । दस्ता आगे बढ़ा । इतने में तलवार लिए मोतीबाई टूट पड़ी । लैफ़्टिनेट ने पिस्तौल चलाई । खाली गई । मोतीबाई ने एक वार मे ही उसको खतम कर दिया । दूसरे लैफ़्टिनेट ने तलवार के हाथ किये, परन्तु मोतीबाई ने उसको भी समाप्त किया । नीचे वाले दोनों अफ़सर एक पत्थर की आड में छिप गये । इतने में झाँसी के दूसरे सिपाही वहा आ गये । खुदाबख्श के तोपखाने ने आगे बढ़ते हुये दस्ते को नष्ट कर दिया और मोतीबाई के निकट वाले सिपाहियो ने उन दोनो लैफ़्टिनेट को बन्दूक से समाप्त कर दिया । यह अंग्रेज़ी सेना की दूसरी हार हुई । उत्तरी फाटको पर भी ज़ोर का हमला था, परन्तु ठाकुरो, काछियो, कोरियो और तेलियो की चतुरता तथा बहादुरी के कारण वहा अंग्रेज़ कुछ नही कर पा रहे थे । इधर दक्षिणी मोर्चों पर अंग्रेजो ने तीसरा आक्रमण शुरू किया ।