झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४०५ रोज़ जीवनशाह की टौरिया के पीछे घोड़े पर था और उसके मातहत अफ़सर बगल में । रोज़ ने कहा, 'नाऊ आर नैव्हर ( या तो अभी या कभी नही ) ।' तार से यह आदेश ओर्छा फाटक टेक और जार पहाड़ी के तोपखानो को दिया गया । ओर्छा फाटक टेक ने इसका जो अर्थ लगाया वह लाल झंडे को और ऊँचा करना था । इधर रोज़ के चार अफ़सर—चारो लैफ़्टिनेट—यौवन प्रमत्त— टेकडियो, पत्थरो और अपनी तोपो की बाढो की आड़े लेते हुए सैयरफाटक की दाहिनी बगल की टेक की दीवार के नीचे पहुँच गये । उस जगह दीवार थोड़ी देर पहले ही आधी ध्वस्त हो गई थी । साथ ही उस जगह वाले झांसी के सैनिक मारे गये थे । इन अफ़सरो में से दो ने अपनी देह की सीडी बनाई । उन पर-से-बाकी दोनो चढ़ गये । इन दोनो ने अपनी सेना के एक दस्ते को सकेत किया । दस्ता आगे बढ़ा । इतने में तलवार लिए मोतीबाई टूट पड़ी । लैफ़्टिनेट ने पिस्तौल चलाई । खाली गई । मोतीबाई ने एक वार मे ही उसको खतम कर दिया । दूसरे लैफ़्टिनेट ने तलवार के हाथ किये, परन्तु मोतीबाई ने उसको भी समाप्त किया । नीचे वाले दोनों अफ़सर एक पत्थर की आड में छिप गये । इतने में झाँसी के दूसरे सिपाही वहा आ गये । खुदाबख्श के तोपखाने ने आगे बढ़ते हुये दस्ते को नष्ट कर दिया और मोतीबाई के निकट वाले सिपाहियो ने उन दोनो लैफ़्टिनेट को बन्दूक से समाप्त कर दिया । यह अंग्रेज़ी सेना की दूसरी हार हुई । उत्तरी फाटको पर भी ज़ोर का हमला था, परन्तु ठाकुरो, काछियो, कोरियो और तेलियो की चतुरता तथा बहादुरी के कारण वहा अंग्रेज़ कुछ नही कर पा रहे थे । इधर दक्षिणी मोर्चों पर अंग्रेजो ने तीसरा आक्रमण शुरू किया ।