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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 417

४०६ झांसी की रानी रानी ने किले पर से देखा कि ओर्छा फाटक का तोपखाना बहुत मन्द गति से काम कर रहा है। उन्होने रामचन्द्र देशमुख को तुरन्त भेजा, परन्तु देशमुख को वहा तक पहुँचने के लिये समय चाहिये था। मोतीबाई खुदाबख्श के पास पहुँच गई। ओर्छा फाटक की टेक के पीछे लाल झण्डा और ऊँचा हुआ। खूब हिला फिर छिप गया। दूल्हाजू ने केवल बारूद भर भरकर तोप चलाई—उसमें से गोले निकलते ही कैसे ? सुन्दर उससे पश्चिम की ओर जरा हट कर ऊँची बुर्ज पर से तोप चला रही थी। उसके साथी गोलन्दाज मारे जा चुके थे। केवल उसकी तोप कुछ काम कर रही थी। उसने दूल्हाजू का व्यापार देख लिया। सामने की टेक के पीछे से गोरी पलटने टिड्डी दल की तरह उबर पडी और 'हुर्रा' घोष करती हुईं भरोसे के साथ ओर्छा फाटक पर दौडीं। दूल्हाजू लोहे का एक छड हाथ में लेकर बुर्ज से नीचे तुरन्त उतरा। सुन्दर को समझने में एक क्षण की भी देर नही लगी। उसने भी तोप छोड दी। केवल तलवार उसके पास थी। तलवार खींच कर अपनी बुर्ज से नीचे उतरी। वहा से ओर्छा फाटक जरा दूर पडता था। सुन्दर के नीचे उतर पाने के पहले ही दूल्हाजू फाटक के पास पहुँच चुका था। फाटक पर मोटी साकलो और कुन्दो में मोटी भर वाले ताले पडे हुये थे। कुन्जियाँ किले मे थी, परन्तु दूल्हाजू के हाथ में लोहे की मोटी छडी तो थी। उसने ज़रा भी बिलम्ब नही किया। उछल कर ताले में छड डाली। तडाक से ताला टूट गया। दूसरे और तीसरे में डाली। सब टूट गये। दो साकलो को भी तोड दिया और तीसरी साकल खोल दी। फाटक केवल भिडे रह गये। दूल्हाजू फाटको को खोल नही पाया था कि नङ्गी तलवार लिये सुन्दर आ पहुँची। 'देशद्रोही, नरक के कीडे,' सुन्दर ने कडककर कहा, तू अंग्रेजो मे कुछ नही पावेगा।' सुन्दर दूल्हाजू पर पिल पडी।