झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४०७ उसकी तलवार का वार दूल्हाजू ने लोहे की छड पर झेला । तलवार भन्ना कर बीच से टूट गई । तलवार का जो टुकडा सुन्दर की मुट्ठी में बचा था उसी को तानकर सुन्दर दूल्हाजू पर उछली । दूल्हाजू ने छड का सीधा हूला दिया । वह ठप से बाये वक्ष पर लगा । साथ ही बाहर तुमुल 'हुर्रा' घोष हुआ । चोट की परवाह न करके सुन्दर ने फिर वार किया । दूल्हाजू पीछे हटा । परन्तु उसने सुन्दर के पेट पर छड अडा दी । उधर गोरो ने धक्के से फाटक खोल लिया । सुन्दर के मुँह से 'हर हर महादेव' निकला था कि एक गोरे की गोली ने सौन्दर्यमयी सुन्दर को अमर कर दिया । गोली उसके सिर पर पडी थी । दूल्हाजू ने छड पृथिवी पर टेक दी । दूल्हाजू पर भी गोरो की बन्दूके सीधी हुई परन्तु उनके अफसर ब्रिगेडियर ने तुरन्त निवारण किया, 'आवर मैन' ( अपना आदमी है ) । गोरो ने बन्दूके नीची करली । टिड्डी दल की तरह भीतर घुस पडे । अफसर ने कहा, 'यह रानी है ?' दूल्हाजू ने उत्तर दिया, 'नही साहब महज नौकरानी ।' अफसर ने अपने साथियो से कहा, 'बट ए सोल्जर शी विल हैव ए सोल्जर्स आनर ।' (लेकिन सिपाही है । सिपाही की इज्जत उसको मिलेगी ) । स्वर्गवासिनी सुन्दर की दृढ मुट्ठी अभी ढीली नही हुई थी । तलवार का छोटा-सा टुकडा अब भी उसकी मुट्ठी में था । दो गोरे उसके शरीर को बाहर ले गये और पत्थरो से दाब दिया । जहा उनके और नत्थेखा के भी अनेक सिपाही दबे हुये थे । उसके उपरान्त वे लोग सब दिशाओ में, शहर में घूमने लगे । टेक के पीछे से रोज के पास तार द्वारा नगर विजय का संवाद पहुँचा ।