भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 418

लक्ष्मीबाई ४०७ उसकी तलवार का वार दूल्हाजू ने लोहे की छड पर झेला । तलवार भन्ना कर बीच से टूट गई । तलवार का जो टुकडा सुन्दर की मुट्ठी में बचा था उसी को तानकर सुन्दर दूल्हाजू पर उछली । दूल्हाजू ने छड का सीधा हूला दिया । वह ठप से बाये वक्ष पर लगा । साथ ही बाहर तुमुल 'हुर्रा' घोष हुआ । चोट की परवाह न करके सुन्दर ने फिर वार किया । दूल्हाजू पीछे हटा । परन्तु उसने सुन्दर के पेट पर छड अडा दी । उधर गोरो ने धक्के से फाटक खोल लिया । सुन्दर के मुँह से 'हर हर महादेव' निकला था कि एक गोरे की गोली ने सौन्दर्यमयी सुन्दर को अमर कर दिया । गोली उसके सिर पर पडी थी । दूल्हाजू ने छड पृथिवी पर टेक दी । दूल्हाजू पर भी गोरो की बन्दूके सीधी हुई परन्तु उनके अफसर ब्रिगेडियर ने तुरन्त निवारण किया, 'आवर मैन' ( अपना आदमी है ) । गोरो ने बन्दूके नीची करली । टिड्डी दल की तरह भीतर घुस पडे । अफसर ने कहा, 'यह रानी है ?' दूल्हाजू ने उत्तर दिया, 'नही साहब महज नौकरानी ।' अफसर ने अपने साथियो से कहा, 'बट ए सोल्जर शी विल हैव ए सोल्जर्स आनर ।' (लेकिन सिपाही है । सिपाही की इज्जत उसको मिलेगी ) । स्वर्गवासिनी सुन्दर की दृढ मुट्ठी अभी ढीली नही हुई थी । तलवार का छोटा-सा टुकडा अब भी उसकी मुट्ठी में था । दो गोरे उसके शरीर को बाहर ले गये और पत्थरो से दाब दिया । जहा उनके और नत्थेखा के भी अनेक सिपाही दबे हुये थे । उसके उपरान्त वे लोग सब दिशाओ में, शहर में घूमने लगे । टेक के पीछे से रोज के पास तार द्वारा नगर विजय का संवाद पहुँचा ।