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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 419

४०८ झांसी की रानी रोज ने अफसरों से कहा, 'उस आदमी को जागीर में गांव पक्के हुये।' दूल्हाजू के उस कृत्य का समाचार बहुत शीघ्र चारो ओर फैल गया। फिर रोज ने तुरन्त आदेश दिया कि सैंयर फाटक को तोड़ो शहर में बढ़ो और सब बागियों का नाश करो। खुदाबख्श के फाटक पर कहर पर कहर बरसने लगे। इसी समय रामचन्द्र देशमुख घोड़े पर आया। उसी समय एक गोली खुदाबख्श को लगी। सैंयर फाटक का तोपखाना बन्द हुआ। एक अङ्गरेज दीवार पर चढ़ा। मोतीबाई ने तलवार से उसका सिर कलम कर दिया और खुदाबख्श की लाश को टांग कर नीचे उतर आई। रामचन्द्र ने मोतीबाई को अपने पीछे घोड़े पर बिठलाया और लाश को सामने लाद कर किले पर चढ़ आया। उसके किले में आते ही किले का फाटक बन्द कर लिया गया। लाश को महल के पास रख कर ढक दिया गया। मोतीबाई की आंख से आँसू नही निकला। रानी आ गई। 'मोतीबाई,' रानी ने कहा, 'तुम लोगो का अक्षय कर्म मैने अपनी आंखो देखा है।' सरकार मोतीबाई ने भर्राये हुये स्वर में कहा, 'काम देखिये। अपने पास किला अब भी है और आप हैं। मैं इनका प्रबन्ध करती हूँ।' 'महल के बिलकुल निकट ही,' रानी कण्ठ को संयत कर के बोली, 'कुंवर साहब को दफनाया जावे।' देशमुख ने पूछा, 'सुन्दर ?' 'ओर्छा फाटक पर मारी गई,' मोतीबाई ने उत्तर दिया, 'दूल्हाजू ने देश द्रोह करके फाटक खोल दिया।' रानी ने ओठ सटाये। धीरे से बोली, 'जीवन में यही बड़ा भारी धोखा खाया।' फिर उन्होंने ज़रा जोर से कहा, 'बरहामुद्दीन ने ठीक कहा था उसके साथ अन्याय हुआ। कहा है, कुछ जानते हो देशमुख ?'