झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४०६ 'नही सरकार,' देशमुख ने सक्षिप्त उत्तर दिया । रानी ने अंगरखे की जेब में हाथ डाला । बरहामुद्दीन का इस्तीफा जेब में था । उसको उन्होने वही पडा रहने दिया । मोतीबाई ने महल के पास ही कबर के लिये मिट्टी खुदवानी आरम्भ करदी और बहुत शीघ्र एक बडा गड्ढा खुदवा लिया । रानी दूरबीन लेकर ऊपर के बुर्ज पर चढ गईं । रोज़ नगर की बुर्ज पर बुर्ज अपने अधिकार में करता चला जा रहा था । गोरे शहर भर में फैलते चले जा रहे थे । झासी की सेना मरती- कटती जा रही थी । आगें लगाई जा रही थी । झांसी मे हाहाकार हो रहा था और उसके साथ तुमुल 'हुर्रा' घोष । रानी ने देखा कि शहर वाले महल' नाटकशाला और महल के सामने वाले विशाल पुस्तकालय को, गोरे घेरने का प्रयास कर रहे हैं और इन स्थानो के भीतर बन्द झाँसी के सैनिक लड रहे हैं । तब वे बुर्ज से नीचे उतर आई । एक पेड के नीचे पत्थर पर बैठकर सोचने लगी, 'झाँसी का सर्वनाश होने को है । स्वराज्य की स्थापना अभी दूर है । परन्तु कर्म करने मात्र का अधिकार है, फल से हमको क्या ?' उठ खडी हुईं । जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह, गुलामगौस, भाऊ बख्शी, गुलमुहम्मद; भोपटकर इत्यादि सरदारो को बुलवाया । उन लोगो को अपना निश्चय सुनाया — 'बाहर निकल कर लडो, गोरो को शहर से निकालो और झाँसी की रक्षा करो ।' सलाह सम्मति का न तो समय था और न मौका । गुलमुहम्मद ने कहा, 'हुजूर को शुक्रिया । फौरन चले । गोरो को शहर से निकालें ।'