भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४१० झाँसी की रानी रानी ने आदेश दिया, 'गोलन्दाज़ अपने अपने ठियो पर काम करते रहें।' भाऊ बख्शी ने आगे बढकर रानी के पैर पकड लिये । प्रार्थना की, 'सरकार मुझको बाहर साथ जाने की आज्ञा दी जाय । मेरी तोप पर किसी और को कर दिया जाय ।' 'अच्छा, गोलन्दाज़ो में से केवल तुम', रानी ने कहा, 'जल्दी करो । विलम्ब का काम नही है ।' बख्शी साथ हो गया । भोपटकर की इच्छा न थी कि रानी बाहर जाकर लड़े, परन्तु वह स्तब्ध रह गया । रानी फुर्ती के साथ तैयार होकर किले के बाहर हो गईँ । साथ में पठान, बुन्देलखण्डडी इत्यादि पन्द्रह सौ सैनिक । पीछे भोपटकर भी गया । दक्षिण की ओर से आ आकर गोरे महल के पश्चिम की ओर बढ रहे थे । रानी झंझावात की तरह पहले दक्षिण की ओर झपटी, जहा से अंग्रेजी सेना घुसी चली आ रही थी । रानी का छापा इतना प्रचण्ड था कि अंग्रेजी सेना भागी । पूर्व की ओर के मकानो की आड से बन्दूके चलाने लगी । तलवारो की मार के सामने वह बिलकुल न ठहर सकी । रानी ने चिल्लाकर कहा, 'आज प्रमाणित कर दो कि हिन्दुस्थानी सिपाही की तलवार के सामने संसार का कोई योद्धा नही टिक सकता ।' उनके दस्ते ने ऐसी तलवार चलाई कि गोरी पल्टन बिखर कर हट गई, परन्तु मकानो की आड से गोलिया चलाने लगी । पाच सौ पठान दक्षिण और पूर्व दिशाओ में फैलकर फिर भी गोरो को पीछे हटाते रहे— और मरते रहे । रानी के महल और हाथीखाने के आसपास* टकसाल तक गोरी सेना फैली हुई थी और उसके लिये मकानो की आड थी । उसका जवाब देने के लिये रानी की सेना भी उसी प्रकार और उसी दिशा में फैली । गोरी सेना के कुछ सिपाही दबाव पड़ने के कारण ❉अब यहां सदर अस्पताल है । अस्पताल के उत्तर में टकसाल मुहल्ला ।