भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 422

लक्ष्मीबाई ४११ पश्चिम दिशा की ओर खण्डेराव फाटक की ओर बढ़े। वहा उनको अटकना पडा। रानी उसी ओर बढ़ रही थी कि उन्होने देखा एक सिपाही किसी मकान में से निकल पडा और अकेले उन कई गोरो से भिड़ गया। उसने ऐसी तलवार चलाई कि कई गोरे हताहत हुये। कुछ और गोरे आ गये। वह सिपाही घिर गया। तो भी वह अकेला उनको पछेलता गया। रानी ने अपने घोडे को तेज किया। पीछे पीछे उनके सिपाही दौडे। रानी के पहुचते पहुँचते वह सिपाही और गोरे पचकुइयो से नीचे की तरफ पहुच गये। उस अकेले सिपाही ने फिर कई गोरो को तलवार के घाट उतारा, परन्तु यकायक उस पर कई वार पडे और वह गिर गया। इतने में रानी सैनिको सहित आ पहुँची। गोरे भाग गये। रानी ने पास जाकर देखा—बरहामुद्दीन था। उसके मरने में कुछ क्षण बाकी थे। बेचैन था। रानी घोडे पर से उतरी। बरहाम के सिर पर हाथ फेरा। बहराम ने पहिचान लिया। उसने आंखे फाडी। पूरा बल लगाया। लेकिन कठिनाई से बोल पाया, 'हुजूर, माफी।' मुश्किल से रानी के मुह से निकला, 'तुम सच्चे सिपाही हो। माफ किया।' फिर जोर लगाकर बरहाम ने कहा, 'सरकार, जान नही निकलती। मेरी चि ट्...ठी।' रानी ने जेब से उसके इस्तीफे का कागज निकाला। 'यह लो', रानी बोली। 'नही, स र ⸱ का...र', बडी मुश्किल से बरहाम ने कहा, 'फाड ⸱ डा ⸱ लि ये तब ⸱⸱ जान नि ⸱ क ⸱⸱ ले गी।' रानी ने तुरन्त चिट्ठी की चिन्दी चिन्दी कर डाली। बरहामुद्दीन के मुखमण्डल पर उस घोर पीडा मे आनन्द की छाप लग गई। उसके अन्तिम शब्द थे 'ज ⸱⸱ ल ⸱ वा...अल्ला...ह...' भाऊ ने आकाश की ओर दृष्टि करके कहा,