झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१२ झाँसी की रानी 'आहा कैसा मीठा मरण है यह ! भगवन् मेरी भी ऐसी ही सद्गति हो ।' बरहामुद्दीन का प्राणान्त हो गया । रानी ने हुकुम दिया । इसी स्थान पर इसकी कबर बनाई जाय ।* पास के रहने वालों को कबर का प्रबन्ध देकर रानी और उनके सैनिक गोरो पर झपटे । वे भागे । अब पश्चिम से पूर्व होती हुई दक्षिण तक रानी के सैनिको की एक पात सी बन गई । पीठ पर किला था । यकायक वृद्ध नाना भोपटकर रानी के सामने आ गया । बोला, 'पहले इस बूढे ब्राह्मण का वध करिये तब आप गोली खाइये ।' रानी—'नाना साहब, यह क्या ?' नाना—'आप देखती नही हैं, गोरे मकानो की आड से गोली चला रहे हैं और आपके सैनिक हताहत हो रहे है । आप पर एक गोली पडी कि समग्र झासी रसातल को गई । अभी अपने हाथ मे किला है । लडाई जारी रखी जा सकती है । लौटिये या मेरा वध करिये ।' रानी की समझ में आ गया । गुलमुहम्द पास आ गया था । उसने भी कहा, 'सरकार, बुड्ढा ठीक बोलता हे । अन्दर चले ।' उत्तरी फाटक से रानी किले मे भाऊ और नाना भोपटकर के साथ चली गईं गुलमुहम्मद के साथ तीन सौ पठान ही भीतर जा सके । बाकी सब बाहर लडाई में मारे गये । बुन्देलखण्डडी सैनिक लगभग सब कट मरे । किले के फाटक बन्द कर लिये गये ।
- बरहामुद्दीन की कबर उसी जगह बा० जासोनाथ चौधरी के बाग में, और कबरो के पास है ।