भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४२२ झांसी की रानी

में उलझाये हुये था। इधर से रानी की टुकड़ी पहुंची। जलते हुये मकानों के प्रकाश में थोड़ी देर के लिये विकट युद्ध हुआ। बख्शी ने फाटक खोल दिया और फिर अपने कोरी सैनिको को लेकर अङ्गरेज टुकड़ी पर टूट पड़ा। जान पड़ता था कि उसको जीवन का मोह नही। वैसे ही निर्मोही पठान थे। बख्शी फाटक के बगल में मारा गया। उसने मरने के पहले रानी को देख लिया था। मरने के पहले उसने 'हर हर महादेव' और 'झांसी की रानी की जय' का घोष किया था। उसके शरीर पात को रानी ने देखा, परन्तु इतना समय भी न था कि मुह से 'धन्य' भी कह पाती। थोडे से लोगो के साथ रानी बाहर हो गईं। मरने से बचे हुये अङ्गरेज सैनिक भाग गये। कोरियो ने भांडेरी फाटक फिर बन्द कर लिया* और भाऊ बख्शी को एक जलते हुये मकान के अँगारो में डालकर उसकी अन्त्येष्टि कर दी। रानी और उनके साथियो को कोट के बाहर की भूमि का राई रत्ती पत्ता था। अन्धेरे में वह सहज ही बढती चली गईँ। बातचीत विलकुल धीरे धीरे होती थी। अञ्जनी की टोरिया के पास ओर्छे की सेना का पहरा था और एक अँग्रेजी छावनी का। यहाँ रोक टोक हुई। लड़ाई भी। यहां से रानी के साथ केवल दस बारह सवार रह गये और मुन्दर। आगे निर्गम मार्ग। अगाध अँधेरा। झींगुर झङ्कार रहे थे। उनके ऊपर घोडो की टापो की आवाज हो रही थी। सब ओर सन्नाटा छाया हुआ था। पीछे झांसी में आगें जल रही थी और आवाजे आ रही थी। आगे अन्धकार मे जगल और गडमऊ का पहाड लिपटे हुये, दवे हुये से दिखलाई पड़ रहे थे। चिडिया पेड़ो पर से भड-भडाकर उडती और घोड़ो को चौंका देती। घोड़े जल्दी चलाये जाने के कारण ठोकर ले ले पड़ते थे। आगे का मार्ग अन्धकार पूर्ण और भविष्य तिमिराच्छन्न। ज्यो त्यो *यह फाटक ७५ वर्ष तक ज्यो का त्यो बन्द रहा। १९३३ के जाड़ो में खोला गया।